(मंच खाली है। एकमात्र प्रकाश-पुंज। वक्ता स्थिर खड़ा है, मानो किसी ऐसी चीज़ की प्रतीक्षा कर रहा हो जो पहले ही आ चुकी है।)
मैं कभी भाग्य शब्द से भागता था—
मानो उसका नाम लेना
उसे और शक्तिशाली बना देगा।
मैं खुद से कहता था
कि चुनाव पूर्ण स्वतंत्र है,
कि हर मोड़ मेरा है,
कि भविष्य शिष्टता से
मेरी अनुमति की प्रतीक्षा करता है।
कितना सुकून देने वाला था यह विश्वास।
कितना नाज़ुक।
(ठहराव)
क्योंकि जीवन
बिन बुलाए आने में माहिर है,
और तुम्हारे रास्ते में
खड़ा हो जाता है—
तुम्हारे तर्कों की
कोई परवाह किए बिना।
(वह एक कदम आगे बढ़ता है।)
मैंने उससे बचने की कोशिश की
जो होना ही था।
मैंने रास्ते बदले।
निर्णयों को टाला।
मैंने खुद से कहा—
अभी नहीं।
यह नहीं।
मैं नहीं।
पर भाग्य पीछा नहीं करता।
वह प्रतीक्षा करता है।
और जब वह तुमसे मिलता है—
तो वह आश्चर्य से कम
और पहचान से अधिक लगता है।
(ठहराव)
जो होना है
वह अनुमति नहीं माँगता।
वह डर से सौदेबाज़ी नहीं करता।
वह बस
घटित होता है—
धैर्य से,
सटीकता से,
अनिवार्य रूप से।
मैंने एक बार उससे लड़ाई की।
तर्क से।
परिश्रम से।
इनकार को साहस समझकर।
मुझे लगा विरोध ही शक्ति है।
मुझे लगा टालना ही स्वतंत्रता है।
पर भाग्य
दबाव में टूटता नहीं।
वह तुम्हें
अपनी ओर मोड़ देता है।
(स्वर धीमा हो जाता है।)
हर कदम जो मैंने दूर रखा,
वह केवल
लौटने का
लंबा रास्ता था।
हर बंद दरवाज़ा
शांतिपूर्वक
मेरे हाथों को
उस द्वार की ओर ले गया
जो खुलना ही था।
हर क्षति
क्रूर लगी—
जब तक उसने
उस चीज़ के लिए
स्थान नहीं बना दिया
जो पहले से
आ रही थी।
(ठहराव)
भाग्य को
सुख में नहीं पहचाना जाता।
उसे पहचाना जाता है
जब संघर्ष
जाने से इंकार कर दे।
जब वही सत्य
अलग-अलग चेहरों में
बार-बार लौटे।
जब जीवन
खुद को दोहराता रहे
जब तक तुम
सुनना न सीखो।
(वह ऊपर देखता है।)
जो अडिग है
उसका विरोध क्यों?
जो ठहरता है
उससे डर क्यों?
जो होना है
अपना गुरुत्व
खुद लिए होता है।
तुम भटक सकते हो—
पर अंततः
उसी की ओर गिरोगे।
(ठहराव)
अनिवार्यता को स्वीकार करने में
एक विचित्र शांति है।
निष्क्रियता की शांति नहीं—
बल्कि सामंजस्य की शांति।
यह जानने की शांति
कि तुम्हारे
भटकाव
गलतियाँ नहीं थे,
बल्कि
तैयारियाँ थीं।
(वह गहरी साँस लेता है।)
भाग्य
चयन नहीं छीनता।
वह चयन को
अर्थ देता है।
वह तुम्हें यह तय करने देता है
कि तुम कैसे पहुँचोगे—
यह नहीं कि
तुम पहुँचोगे या नहीं।
(ठहराव)
अब मैं देख पा रहा हूँ—
कैसे हर क्षण
खुद को
व्यवस्थित कर रहा था।
कैसे मेरा विरोध भी
योजना का ही
एक हिस्सा था।
मैं कभी खोया नहीं था।
मुझे उन रास्तों से
ले जाया जा रहा था
जिन्हें मैं
समझ नहीं पा रहा था।
(वह प्रकाश में आगे बढ़ता है।)
जो होना है
टाला नहीं जा सकता—
पर उसका सामना
अनुग्रह से किया जा सकता है,
या डर से।
आज, मैं
अनुग्रह चुनता हूँ।
इसलिए नहीं कि
मैं सब समझ गया हूँ—
बल्कि इसलिए कि
मैं उस पैटर्न पर
भरोसा करता हूँ
जो केवल
पीछे मुड़कर देखने पर
दिखाई देता है।
(दीर्घ ठहराव)
मैं दौड़ना बंद करता हूँ।
मैं सौदेबाज़ी बंद करता हूँ।
मैं यह नाटक बंद करता हूँ
कि भाग्य को
छल लिया जा सकता है।
मैं वहीं खड़ा हूँ
जहाँ मुझे
खड़ा होना था—
पराजित नहीं,
बल्कि तैयार।
क्योंकि
जो होना था
वह
मुझे पहले ही
पा चुका है।
(प्रकाश मंद पड़ता है। मौन।)
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