(एक अकेला व्यक्ति धीरे-धीरे मंद रोशनी के नीचे खड़ा है, हल्की बारिश गिर रही है। वह किसी अनदेखे व्यक्ति या शायद सिर्फ यादों से बात करता है।)
मोनोलॉग:
"लंबा समय… मुलाक़ात नहीं हुई। कितना अजीब लगता है जब ये शब्द जुबान से निकलते हैं, वर्षों की दूरी, खामोशी और अनुपस्थिति का बोझ लिए हुए। लंबा… समय… मुलाक़ात नहीं हुई। यह सिर्फ शब्द नहीं हैं—ये टूटी हुई पुल की छोटी-छोटी ईंटें हैं, जिन्हें मैं इन सालों से जोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ।
क्या तुम्हें याद है? क्या तुम्हें सच में याद है? ऐसे दिन थे जब तुम्हारी हँसी सुबह की धूप जैसी थी, और तुम्हारा अभाव सितारों से खाली रात जैसी। और फिर भी, मैं यहाँ हूँ, परछाइयों से बात करता हूँ, गूँजों से बात करता हूँ, उम्मीद करते हुए… उम्मीद करते हुए कि कहीं, किसी तरह, ये शब्द तुम्हारे तक पहुँच जाएँ।
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