(पृष्ठभूमि में एक बड़ा गोलाकार साया धीरे-धीरे घूम रहा है। वक्ता उसके नीचे खड़ा है, मानो उसकी गति में बँधा हुआ हो।)
तो—
यह घूम गया।
मैंने इसे देखा नहीं,
पहले महसूस किया।
हवा में वह हल्का-सा बदलाव,
किसी विशाल वस्तु की
शांत-सी चरमराहट,
जो अपनी जगह बदल रही थी।
वे हमें चेतावनी देते हैं, है न?
कहते हैं— "कुछ भी स्थायी नहीं है।"
लेकिन चेतावनियाँ नरम होती हैं,
और चक्र—
नरम नहीं होता।
एक क्षण पहले मैं शिखर पर था—
स्थिर, आत्मविश्वासी, प्रकाश में नहाया हुआ।
मेरे पैरों तले ज़मीन
स्थायी लगती थी।
मैंने ऊँचाई को
सुरक्षा समझ लिया।
यही मेरी पहली भूल थी।
(वह धीरे-धीरे गोल चक्कर लगाता है।)
शिखर पर
गुरुत्वाकर्षण भूल जाता है मनुष्य।
भूल जाता है
कि हर चढ़ाई में
गिरावट का बीज छिपा होता है।
तुम मानने लगते हो
कि दृश्य तुम्हारा अधिकार है।
मैंने भी यही माना।
तालियाँ प्रमाण लगने लगीं।
सफलता अर्जित—और शाश्वत—लगने लगी।
मैंने इसे स्थिरता कहा,
सौभाग्य नहीं।
मैंने योग्यता की बात की,
कभी कृपा की नहीं।
(विराम।)
फिर भाग्य का चक्र घूम गया।
धीरे-धीरे नहीं।
सभ्यता के साथ नहीं।
बल्कि सत्य की तरह—
अचानक।
एक हानि।
एक उलटफेर।
एक ऐसा घंटा
जिसने वर्षों को मिटा दिया।
और मैं—
जो कभी नीचे देखता था—
अब ऊपर देख रहा था,
दूसरों को वहाँ खड़ा देखता हुआ
जहाँ कभी मैं खड़ा था।
(उसकी आवाज़ सख़्त हो जाती है।)
सम्मान कितनी जल्दी
स्मृति बन जाता है।
निश्चितता कितनी तेज़ी से
ढीली पड़ जाती है।
नीचे सब कुछ
अलग तरह से सुनाई देता है।
हँसी देर तक गूँजती है।
मौन अधिक भारी लगता है।
तब पता चलता है
कि संगीत रुक जाने पर
कौन-सी आवाज़ें साथ रहती हैं।
(विराम।)
मैं क्रोधित हुआ—
स्वाभाविक ही था।
मैंने इसे अन्याय कहा।
मैंने पूछा—
मेहनत बीमा क्यों नहीं बनी?
निष्ठा ने भाग्य को
थाम क्यों नहीं लिया?
लेकिन चक्र
कोई सफ़ाई नहीं देता।
वह बस घूमता है।
यही उसका
एकमात्र वादा है।
(वह घूमते साये की ओर देखता है।)
इसे देखो—
न कोई आरंभ, न कोई अंत।
सिर्फ़ गति।
ऊपर वाले गिरते हैं।
नीचे वाले उठते हैं।
इसलिए नहीं कि वे इसके योग्य हैं—
बल्कि इसलिए
कि चक्र संतुलन चाहता है।
(उसका स्वर नरम पड़ता है।)
गिरावट में
मैंने वे बातें सीखीं
जो ऊँचाई कभी नहीं सिखा पाई।
मैंने जाना
तालियों की नाज़ुकता।
सत्ता की अस्थिरता।
और यह भी
कि पद हटते ही
पहचान कितनी जल्दी
घुल जाती है।
लेकिन मैंने
एक और बात भी सीखी।
मैंने विनम्रता सीखी।
दिखावे वाली नहीं—
बल्कि वह शांत समझ
कि कोई भी
अपने क्षण का स्वामी नहीं होता।
हम उसे
उधार लेते हैं।
(विराम।)
जब चक्र ने मुझे ऊपर उठाया था,
मैंने सोचा था
मैं चुना गया हूँ।
अब समझ में आता है—
मैं बस अगला था।
और हम सब भी।
(वह एक क़दम आगे बढ़ता है।)
यह ज्ञान
खड़े होने का ढंग बदल देता है।
अब तुम न गर्व से
नीचे देखते हो,
न ईर्ष्या से
ऊपर।
तुम चारों ओर देखते हो—
समझ के साथ।
क्योंकि हम सब
एक ही चक्र पर सवार हैं,
बस अलग-अलग बिंदुओं पर।
(वह गहरी साँस लेता है।)
भाग्य का चक्र घूमता है।
हमेशा घूमता आया है।
हमेशा घूमता रहेगा।
त्रासदी गिरना नहीं है—
बल्कि यह भूल जाना है
कि उठना कभी स्थायी नहीं था।
बुद्धिमत्ता चढ़ने में नहीं—
बल्कि मनुष्य बने रहने में है,
जहाँ भी
चक्र हमें रख दे।
(वह दर्शकों की ओर मुख करता है।)
मुझे नहीं पता
अगली बार घूमने पर
मैं कहाँ होऊँगा।
ऊपर।
नीचे।
या कहीं बीच में।
लेकिन यह मैं जानता हूँ—
मैं पद को
मूल्य नहीं समझूँगा।
मैं ऊँचाई को
सत्य नहीं मानूँगा।
क्योंकि चक्र
अनुमति नहीं माँगता।
और जब वह घूमता है—
सबके लिए घूमता है।
(साया घूमता रहता है। प्रकाश मंद पड़ता है।)
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