(मंच विस्तृत और मंद प्रकाश में डूबा है। पीछे क्षितिज-सी हल्की रोशनी चमक रही है, मानो कोई विशाल संभावना प्रतीक्षा कर रही हो। वक्ता मंच के मध्य खड़ा है—आँखें उठी हुईं, आकाश की ओर नहीं, बल्कि संभावनाओं की ओर।)
उन्होंने मुझसे कहा—
व्यावहारिक बनो।
उन्होंने यह बात
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