(वक्ता संध्या समय एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता धुंध में खो जाता है, दूसरा आँखों से ओझल होकर मुड़ जाता है। स्वर थका हुआ, आत्ममंथन से भरा, पर दृढ़ है।)
मैं कभी मानता था कि जीवन एक समझौता है—
जो पहले से तय होता है,
मेहनत की मुहर से सील होता है,
...
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