(वक्ता सांझ के समय अकेला खड़ा है। उसके पैरों के पास आधा भरा हुआ सूटकेस रखा है। काग़ज़—योजनाएँ, पत्र, सपने—चारों ओर बिखरे हैं। वह मौन आकाश से बात करता है।)
तो यही थी योजना।
यह—सलीके से नपी-तुली, सावधानी से मोड़ी हुई भविष्य की तस्वीर।
मैंने इसे नक्शे की तरह रचा,
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