(वक्ता एक मंद रोशनी वाले कमरे में खड़ा है, दीवारों पर पुराने तस्वीरें और पत्र लगे हैं। एक हल्की टिक-टिक की आवाज़ ही बाकी ध्वनि है। उनका स्वर गुस्से, दुःख और दृढ़ निश्चय के बीच झूलता है।)
मैं इससे अब और नहीं भाग सकता।
मैंने उन मुस्कानों के पीछे छिपकर खुद को खोया,
जो कभी मेरी नहीं थीं।
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