(मंच शांत है। एक अकेला दीपक धीमी रोशनी में जल रहा है। वक्ता स्थिर खड़ा है, उसकी मुट्ठियाँ खुली हुई हैं, जैसे उसने अभी-अभी कोई अदृश्य बोझ छोड़ दिया हो।)
मैं जीवन को कसकर पकड़े रहता था—
मानो हाथ ढीले पड़ते ही
सब कुछ बिखर जाएगा।
मुझे लगता था कि पकड़ बनाए रखना
ही सच्ची परवाह है।
कि हर परिणाम को नियंत्रित करना
ही समर्पण का प्रमाण है।
इसलिए मैंने योजनाएँ बनाईं।
हिसाब लगाया।
चिंता की।
मैंने इस तरह चिंता की
मानो चिंता ही
हानि को रोक सकती हो।
(ठहराव)
फिर वह क्षण आया
जब मेरी ताकत
और सहारा नहीं दे सकी।
इसलिए नहीं कि मैं असफल हुआ—
बल्कि इसलिए कि
वह बोझ
कभी अकेले उठाने के लिए
था ही नहीं।
तभी
सबसे कठिन सीख सामने आई—
भाग्य पर छोड़ दो।
(वह गहरी साँस लेता है।)
हार मानने की तरह नहीं।
निराशा के आगे झुक जाने की तरह नहीं।
बल्कि इस स्वीकार के रूप में
कि कुछ रास्तों को
खुद ही चलना होता है।
(वह धीरे-धीरे टहलता है।)
हमें लड़ना सिखाया जाता है—
धक्का देना,
ज़ोर लगाना,
माँग करना।
हमें सिखाया जाता है
कि परिश्रम
सब कुछ जीत सकता है।
और परिश्रम महत्त्वपूर्ण है—
हाँ, वह है।
लेकिन एक बिंदु ऐसा आता है
जहाँ ज़ोर लगाना
घाव बन जाता है,
और पकड़े रहना
भरने से इनकार।
(ठहराव)
मैं उस बिंदु पर पहुँचा।
निर्णय की दहलीज़ पर खड़ा,
थकी हुई बाँहों के साथ,
प्रश्नों से जलता हुआ मन।
अगर छोड़ दूँ—
तो क्या सब टूट जाएगा?
अगर ज़बरदस्ती बंद कर दूँ—
तो क्या सब खो जाएगा?
और भाग्य ने फुसफुसाया—
ऊँची आवाज़ में नहीं,
पर स्थिर स्वर में—
विश्वास करो।
(वह ऊपर देखता है।)
विश्वास का अर्थ यह नहीं
कि तुम परवाह करना छोड़ दो।
इसका अर्थ यह है
कि डर से आशा का
गला घोंटना बंद कर दो।
भाग्य पर छोड़ देना
ज़िम्मेदारी से भागना नहीं है।
यह उस भ्रम को छोड़ देना है
कि तुम्हारे हाथ में
सब कुछ था।
(ठहराव)
जब मैंने प्रवाह से लड़ना छोड़ा,
मैंने उसे
खुद को बहाते महसूस किया।
नरमी से नहीं—
दयालु होकर नहीं—
बल्कि ईमानदारी से।
उसने मुझे दिखाया
कि क्या रहने के लिए बना था
क्योंकि वह गया ही नहीं।
उसने मुझे दिखाया
कि क्या जाने के लिए था
क्योंकि
कितना भी कसकर पकड़ा,
वह फिसल गया।
(स्वर कोमल हो जाता है।)
मैंने जो खोया,
उसका शोक किया।
हाँ, किया।
स्वीकार करना
संवेदनहीन होना नहीं है।
वह याद रखता है।
पर दुःख अलग लगने लगा
जब मैंने स्वयं को दोष देना
छोड़ दिया
उसके लिए
जो मेरे वश में
कभी था ही नहीं।
(ठहराव)
भाग्य पर छोड़ने ने
मुझे धैर्य सिखाया।
ऐसा धैर्य
जो उत्तर माँगे बिना
प्रतीक्षा करता है।
इसने मुझे विनम्रता सिखाई—
झुके सिर वाली नहीं,
खुले हाथों वाली।
(वह अपनी हथेलियाँ खोलता है।)
मैंने पूछना छोड़ दिया—
"यह क्यों नहीं हुआ? "
और पूछना शुरू किया—
"यह मुझे क्या सिखा रहा है? "
(ठहराव)
भाग्य स्वयं को
समझाता नहीं।
पर वह
रूपरेखाएँ उजागर करता है।
छोड़ देने के बाद ही
मैं देख पाया
कि हर अंत
किसी न किसी
संतुलन का हिस्सा था।
कि हर बंद दरवाज़ा
मेरे कदमों को
ठीक वहीं मोड़ रहा था
जहाँ मुझे होना चाहिए था।
(वह आगे बढ़ता है।)
भाग्य को स्वीकार करने में
शांति है।
निष्क्रिय शांति नहीं—
बल्कि स्थिर, गहरी शांति।
यह जानने की शांति
कि जीवन
तुम्हारे डर से
कहीं बड़ा है।
(ठहराव)
मैं अब भी चुनता हूँ।
मैं अब भी कर्म करता हूँ।
मैं अब भी
पूरी तरह परवाह करता हूँ।
पर अब
मैं अज्ञात से
दुश्मन की तरह
कुश्ती नहीं लड़ता।
मैं उसके साथ
चलता हूँ।
(वह गहरी साँस लेता है।)
भाग्य पर छोड़ दो—
इसलिए नहीं कि तुम कमज़ोर हो,
बल्कि इसलिए कि
तुम इतने बुद्धिमान हो
कि यह जान सको
क्या तुम्हारा था
और क्या कभी
था ही नहीं।
(दीर्घ ठहराव)
मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ।
और जो मेरे हाथ से
बाहर है—
मैं उसे छोड़ देता हूँ।
(दीपक की रोशनी मंद पड़ती है। मौन।)
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