Friday, January 16, 2026

भाग्य पर छोड़ दो (एक नाट्य-स्वगत) Comments

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(मंच शांत है। एक अकेला दीपक धीमी रोशनी में जल रहा है। वक्ता स्थिर खड़ा है, उसकी मुट्ठियाँ खुली हुई हैं, जैसे उसने अभी-अभी कोई अदृश्य बोझ छोड़ दिया हो।)
मैं जीवन को कसकर पकड़े रहता था—
मानो हाथ ढीले पड़ते ही
सब कुछ बिखर जाएगा।
...
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ashok jadhav
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