(मंच शांत है। एक अकेला दीपक धीमी रोशनी में जल रहा है। वक्ता स्थिर खड़ा है, उसकी मुट्ठियाँ खुली हुई हैं, जैसे उसने अभी-अभी कोई अदृश्य बोझ छोड़ दिया हो।)
मैं जीवन को कसकर पकड़े रहता था—
मानो हाथ ढीले पड़ते ही
सब कुछ बिखर जाएगा।
...
Read full text