(अकेला पात्र मंद रोशनी में खड़ा है, पृष्ठभूमि में घड़ी की टिक-टिक गूंज रही है। आवाज़ धीमी, कांपती हुई शुरू होती है, धीरे-धीरे जोश और दृढ़ता में बदलती है।)
क्या तुम्हें पता है… क्या तुम्हें पता है कि अपने हाथों से जीवन रेत की तरह फिसलता हुआ देखने का एहसास कैसा होता है? उस क्षण पर खड़ा होना जब डर, संकोच, घमंड… और अनिश्चितता तुम्हें जकड़े हुए हों… और तभी… अहसास हो कि वो पल जिन्हें तुम पकड़ सकते थे… वो शब्द जिन्हें तुम बोल सकते थे… वो पुल जिन्हें तुम पार कर सकते थे… सब ठंडे और वीरान हो चुके हैं।
मैं देर हो गया—माफ़ी मांगने में देर, कदम बढ़ाने में देर, जीने में देर… जैसे दुनिया की घड़ी ने अपनी धड़कन तय कर ली हो और मैं अपनी ट्रेन चूक गया हूँ। मैं देखता रहा अवसरों को, जैसे सड़क पर अजनबी गुजर रहे हों, और खुद से कहता रहा, "कल… कल मैं बहादुर बनूँगा। कल… मैं कोशिश करूँगा।"
और फिर… आज मैं यहाँ हूँ। यहाँ… कांपते हुए, शर्मिंदगी और थकान के बीच… लेकिन यहाँ। और इसी कांपती हुई मुद्रा में… मुझे सुनाई देता है, धीरे से लेकिन अडिग: देर आये लेकिन अंधेर नहीं।
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