(वक्ता अकेला खड़ा है, जैसे किसी अदृश्य क्षितिज के सामने। उसकी आवाज़ में विद्रोह, थकान और अंततः शांत स्वीकार्यता है।)
मैं कभी मानता था
कि मेरी मुट्ठियाँ आसमान को आकार दे सकती हैं।
कि अगर मैं उन्हें ज़ोर से भींच लूँ,
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