(मंच धुँधला है। हवा में हल्का धुआँ तैर रहा है, मानो अभी-अभी कुछ जलकर बुझा हो। वक्ता जले हुए किनारों वाले काग़ज़ों के बीच खड़ा है। वह एक काग़ज़ उठाता है और फिर उसे गिरा देता है।)
तो यही बचा है।
राख।
खामोशी।
और उस चीज़ की गंध
जो कभी बहुत मायने रखती थी।
(ठहराव)
मेरी योजनाएँ थीं।
सोची-समझी।
नपी-तुली।
आशा और तर्क की परतों से बनी।
मैंने जीवन की दिशा पर रेखाएँ खींचीं,
यह मानकर कि सटीकता मुझे बचा लेगी।
मैंने कहा था, "अगर मैं यह करूँगा, तो वह होगा।"
मैंने कहा था, "सब मेरे नियंत्रण में है।"
मैंने कहा था, "कुछ भी गलत नहीं होगा।"
आज यह सब कितना मासूम लगता है।
(वह घुटनों के बल बैठकर एक जला हुआ पन्ना उठाता है।)
इन्हें देखो—
मेरी योजनाएँ।
जो कभी विश्वास से भरी थीं,
अब मुड़ी हुई, काली पड़ी हैं,
जैसे आग के बाद झुलसे पत्ते।
वे धीरे-धीरे नहीं टूटीं।
उन्होंने चेतावनी नहीं दी।
वे समय के साथ कमजोर नहीं पड़ीं।
वे धुएँ में उड़ गईं।
(स्वर कठोर हो जाता है।)
एक पल मैं ठोस ज़मीन पर खड़ा था।
अगले ही पल—
ज़मीन गायब हो गई।
एक बैठक रद्द।
एक वादा वापस।
एक दरवाज़ा बिना कारण बंद।
सालों की तैयारी
उतनी ही देर में मिट गई
जितनी देर में आग साँस लेती है।
(ठहराव। वह गहरी साँस लेता है।)
क्या तुम जानते हो
पूरी तरह विफल होने की क्रूरता?
वह असफलता नहीं
जो धीरे से सिखा दे,
बल्कि वह जो कुछ भी खड़ा न छोड़े।
वह जो यह न कहे, "फिर कोशिश करो, "
बल्कि फुसफुसाए, "शुरुआत से शुरू करो।"
(वह धीरे-धीरे खड़ा होता है।)
मैंने गलती खोजने की कोशिश की—
किसी छोटी-सी चूक को दोष देने के लिए।
मैंने हर निर्णय, हर शब्द दोहराया,
उस चिंगारी को ढूँढने की कोशिश में
जिसने आग लगा दी।
पर कभी-कभी
कोई गलती नहीं होती।
कभी-कभी मेहनत भी जल जाती है।
(धीरे स्वर में)
यही सबसे कठिन सत्य है—
कि परिश्रम अस्तित्व की गारंटी नहीं देता।
कि इरादा सफलता का बीमा नहीं होता।
कि सबसे अच्छी योजनाएँ भी
काग़ज़ की तरह नाज़ुक होती हैं।
(वह दूर देखता है।)
लोग कहते हैं, "इससे सीखो।"
मानो हानि कोई कक्षा हो।
मानो विनाश के साथ निर्देश आते हों।
पर जब सब कुछ एक साथ विफल हो जाए,
तो सीख अपमान जैसी लगती है।
सबसे पहले शोक आता है।
(लंबा ठहराव)
मैंने उन योजनाओं का शोक मनाया।
इसलिए नहीं कि वे पूर्ण थीं,
बल्कि इसलिए कि उनमें मेरा विश्वास था।
वे इस बात का प्रमाण थीं
कि मैंने आशा करने का साहस किया।
और अब—
आशा ख़तरनाक लगती है।
(स्वर फिर से मजबूत होता है।)
फिर भी मैं यहाँ खड़ा हूँ।
खंडहरों के बीच।
अब भी साँस ले रहा हूँ।
और इसका अर्थ है—
कुछ तो बचा है
जिसे आग भी नष्ट नहीं कर सकी।
(वह हाथों से राख झाड़ता है।)
योजनाएँ धुएँ में उड़ सकती हैं,
पर इच्छाशक्ति इतनी आसानी से नहीं जलती।
उद्देश्य गर्मी में भी जीवित रहता है।
और राख से—
नई रूपरेखाएँ जन्म लेती हैं।
(ठहराव)
मैं फिर से योजना बनाऊँगा।
अहंकार से नहीं,
विनम्रता से।
निश्चितता से नहीं,
साहस से।
क्योंकि असफलता ढाँचे को तोड़ सकती है,
पर निर्माता को नहीं।
(वह ऊपर देखता है।)
धुआँ उठने दो।
आँखें जलने दो।
मैं उसके पार देखूँगा।
क्योंकि सब कुछ खो जाने के बाद भी,
एक योजना बची रहती है—
उठ खड़े होने की।
(रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ जाती है।)
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