मितरों...
हर हाथ में सूरज दे दिया,
फिर भी घर में अंधेरा क्यों है?
हर जेब में दुनिया दे दी,
फिर भी चूल्हा ठंडा क्यों है?
भाइयों-बहनों...
हमने कहा था — डिजिटल इंडिया,
तुमने बना दिया — रील इंडिया।
हमने कहा था — स्टार्टअप इंडिया,
तुमने बना दिया — स्क्रॉल इंडिया।
मेरे प्यारे देशवासियों...
मन की बात हर रविवार है,
काम की बात का नेटवर्क ही गायब है।
मन में 2047 में विकसित हैं,
तन में 2026 में भी भूखे हैं।
नारा था — 'बहुत हुई महंगाई की मार',
अब ज्ञान है — 'डेटा देखो, महंगाई भूल जाओ यार! '
वादा था — '2 करोड़ रोजगार',
अब लॉलीपॉप है — 'रोजगार मेले में सेल्फी लो, और रील पर आत्मनिर्भर बन जाओ! '
और सुनो, सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक...
नेता बोला — 'फ्री डेटा देंगे! '
हम बोले — 'वाह मोदी जी वाह! रोटी छीन लो, पर रील मत छीनो!
'भूखा पूछता है — अच्छे दिन कहाँ हैं?
स्क्रीन हंसती है — ट्रेंडिंग में हैं, बस और स्क्रॉल करो।बेरोजगार पूछता है — नौकरी कहाँ है?
स्क्रीन कहती है — लिंक्डइन पर ज्ञान बाँटो, नौकरी तो जुमला है।
मितरों, ये जेल अंग्रेजों ने नहीं बनाई,
हमने खुद अपनी उंगली से बनाई है!
ताला दिल्ली में नहीं, दिमाग में है,
चाबी संसद में नहीं, जेब में है!
और हम खोलेंगे नहीं,
क्योंकि इस जेल में —सबका साथ है,
सबका विकास है,
और सबका टाइमपास है!
पाँच इंच की ये जेल छोटी है, पर इसमें पूरा हिंदुस्तान
'वाह मोदी जी वाह' कहते-कहते
हँसते-हँसते दफन हो गया है।
~बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |
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