Thursday, December 24, 2015

Bansuri Chali Aao (बाँसुरी चली आओ) Comments

Rating: 5.0

बाँसुरी चली आओ होंठो का निमंत्रण है
तुम्हे बुलाया कान्हा ने आज दिया आमंत्रण है
बिन तुम्हारे कान्हा अधूरा है
गोपियों के मन में उलझन है
...
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Dhaneshwar Dutt
COMMENTS
Rajnish Manga 24 December 2015

एक सुमधुर कविता जिसमें कान्हा और उसकी बांसुरी समरूप हो जाते हैं. एक के बिना दूसरा नहीं है. इन दोनों का मिलन ही महारास की ओर ले जाने वाला पहला कदम है. धन्यवाद, मित्र. हर तरफ इस दुनिया में कितना अंधकार है बिन तुम्हारे जीना मुझे नही स्वीकार है

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Manonton Dalan 24 December 2015

nice poem Bhai.........

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