बाँसुरी चली आओ होंठो का निमंत्रण है
तुम्हे बुलाया कान्हा ने आज दिया आमंत्रण है
बिन तुम्हारे कान्हा अधूरा है
गोपियों के मन में उलझन है
...
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एक सुमधुर कविता जिसमें कान्हा और उसकी बांसुरी समरूप हो जाते हैं. एक के बिना दूसरा नहीं है. इन दोनों का मिलन ही महारास की ओर ले जाने वाला पहला कदम है. धन्यवाद, मित्र.
हर तरफ इस दुनिया में कितना अंधकार है
बिन तुम्हारे जीना मुझे नही स्वीकार है
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एक सुमधुर कविता जिसमें कान्हा और उसकी बांसुरी समरूप हो जाते हैं. एक के बिना दूसरा नहीं है. इन दोनों का मिलन ही महारास की ओर ले जाने वाला पहला कदम है. धन्यवाद, मित्र. हर तरफ इस दुनिया में कितना अंधकार है बिन तुम्हारे जीना मुझे नही स्वीकार है