इनाम हो जाना Poem by Kunal Kumar

इनाम हो जाना

तिरे निगाह का दिल पर निज़ाम हो जाना
किसी फ़क़ीर के हिस्से इनाम हो जाना

छुपा के रख न सके यार दर्द बरसों तक
अजीब है मिरे हिस्से में ख़ाम हो जाना

कभी जो इश्क़ की बारिश हदों से बढ़ जाए
हर एक ख़्वाब का दरिया के नाम हो जाना

वो एक शख़्स जो मिलता है कम सितारों-सा
उसी का रात के माथे पे बाम हो जाना

मैं अपने आप से लड़ता रहा कई मौसम
तेरा ख़याल था मुश्किल मुक़ाम हो जाना

कमाल रीत है दुनिया की वाक़ई यारों
समय के साथ किसी दिन ग़ुलाम हो जाना

न जाने कौन-सी मिट्टी है तेरी बातों में
कठोर दिल का भी मोम-ए-नियाम हो जाना

किसी की याद को लिखना भी कम नहीं कामिल
कठिन है दर्द का लफ़्ज़ों में आम हो जाना

इनाम हो जाना
Friday, July 31, 2026
Topic(s) of this poem: ghazal,love
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