(मंच खाली है। कोई वस्तु नहीं। शुरुआत में कोई हलचल नहीं। एक अकेला पात्र तीखी सफ़ेद रोशनी में खड़ा है, कंधे तने हुए—मानो किसी टक्कर के लिए तैयार हो। एक लंबा मौन। फिर वह बोलता है।)
तो यही है अंत।
न गरज के साथ।
न विरोध के साथ।
बल्कि एक फीकी-सी आवाज़ के साथ—
किसी चीज़ के गिरने की आवाज़,
और उसे थामने कोई नहीं आता।
(ठहराव।)
लोगों ने मुझसे कहा था—
"साहस दिखाओ।
जोखिम लो।
अपनी बात रखो।"
और मैंने रखा।
मैं आगे बढ़ा—
सीने में विश्वास लिए,
हौसले को तराशकर,
इरादों को सजा कर।
मुझे लगा गति मुझे संभाल लेगी।
मुझे लगा मेहनत तालियाँ दिलाएगी।
कितनी दृढ़ता से
मैंने विश्वास किया था
कि ज़मीन मुझे थाम लेगी।
(वह एक कदम आगे बढ़ता है, फिर रुक जाता है।)
मेरे पास एक दृष्टि थी—
साफ़-सुथरी,
आत्मविश्वास से भरी।
हर शब्द चुना हुआ।
हर भाव नियंत्रित।
मुझे लगा स्पष्टता सम्मान दिलाएगी।
मुझे लगा जुनून प्रभाव डालेगा।
मैं वहाँ खड़ा था—
खुला हुआ,
आशा से भरा,
प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में।
और फिर—
कुछ नहीं।
(मौन।)
न प्रतिध्वनि।
न स्वीकृति की झलक।
न विरोध तक—
सिर्फ़ ख़ालीपन।
यह नाटकीय ढंग से नहीं टूटा।
न किसी को नाराज़ किया।
न ज़ोर से असफल हुआ।
यह पूरी तरह फेल हो गया।
(स्वर कड़ा हो जाता है।)
क्या तुम जानते हो
ऐसी असफलता कैसी लगती है?
यह अस्वीकृति नहीं थी—
अस्वीकृति कम-से-कम यह तो मानती है
कि तुम मौजूद थे।
यह उससे भी बदतर थी।
यह उदासीनता थी।
मेरे शब्द ज़मीन पर गिरे
और वहीं पड़े रहे—
न हिले, न डुले।
मेरी मेहनत बिना वजन के आ गिरी।
मैंने देखा—
मेरे विचार बनने से पहले ही
कमरे से विश्वास निकल गया।
(वह धीरे-धीरे साँस छोड़ता है।)
उस पल मुझे शोर चाहिए था—
ग़ुस्सा,
हँसी,
बहस—कुछ भी,
जो यह साबित कर दे
कि मेरी बात का असर हुआ।
लेकिन मौन निर्दयी होता है।
मौन कहता है—
तुम इतने भी महत्वपूर्ण नहीं थे
कि तुम्हारा विरोध किया जाए।
(ठहराव। वह ज़मीन की ओर देखता है।)
अब मैं उस पल को बार-बार जीता हूँ।
समय।
स्वर।
वह ठहराव जो बहुत जल्दी आ गया।
वह ज़ोर जो बहुत देर से आया।
मैं खुद से कहता हूँ—
"काश…"
काश मैंने ज़ोर से बोला होता।
काश मैंने इंतज़ार किया होता।
काश मैं चुप ही रहा होता।
लेकिन ऐसी असफलता
कोई निर्देश नहीं देती।
यह बस सामने बैठ जाती है—
अनकही,
भारी।
(आवाज़ नरम पड़ती है।)
सबसे ज़्यादा दर्द
असफल होने में नहीं है—
दर्द विश्वास करने में है।
इतना विश्वास
कि मैं वहाँ खड़ा हो सका,
बिना ढाल के।
इतना विश्वास
कि प्रतिक्रिया की उम्मीद कर सका।
जब कोई चीज़
पूरी तरह फेल हो जाती है,
तो वह कोशिश करने के जोखिम को
नंगा कर देती है।
(वह थोड़ा सीधा खड़ा होता है।)
फिर भी—
एक सच है
जिससे मैं बचता हूँ—
फेल हो जाना
हमेशा के लिए गिर जाना नहीं होता।
इसका मतलब यह है
कि असर सुनाई नहीं दिया,
यह नहीं
कि प्रयास बेकार था।
मौन भी निशान छोड़ता है—
अगर कमरे पर नहीं,
तो उस पर
जो बोलने का साहस करता है।
(ठहराव।)
मैंने उस स्थिरता में कुछ सीखा।
सफल होना नहीं—
बल्कि असफलता के बाद
खुद को संभालना।
मैंने सीखा कि साहस
अनदेखा होने से खत्म नहीं होता।
वह इंतज़ार करता है।
वह रूप बदलता है।
वह लौटता है—
कम आवाज़ में,
लेकिन अधिक तीखा।
(वह सिर उठाता है।)
जो आज फेल हुआ,
वह कल
किसी और रूप में उठेगा।
शायद उतना ज़ोर से नहीं।
शायद उतना साफ़ नहीं।
लेकिन अधिक समझदार होकर।
क्योंकि जो असफलता अपमानित करती है,
वही संकल्प को मज़बूत भी करती है।
(एक क्षण।)
तो मान लिया जाए—
यह पूरी तरह फेल हुआ।
हाँ।
लेकिन
मैं नहीं।
(रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ती है। अंधेरा।)
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