सोचता हूँ For Wife Poem by Chirag Bhatia

सोचता हूँ For Wife

सोचता हूँ उनकी तारीफ़ में कुछ लिखा जाए...
उस हसीना को कुछ अल्फ़ाज़ों में सजाया जाए...

देखने में तो दुनिया में चेहरे हज़ार हैं,
पर उसकी सादगी में ही कुछ अलग सा ख़ुमार है।
नखरे थोड़े ज़्यादा हैं, ये बात भी सच है,
पर उसके दिल की मासूमियत सबसे अच्छी है।

प्यार से जब मेरा नाम वो पुकारती है,
थकी हुई रूह में भी जान सी उतारती है।
हँस दे अगर एक बार तो दिन संवर जाता है,
उसकी मुस्कान से हर ग़म बिखर जाता है।

कभी रूठ जाती है तो बातें कम हो जाती हैं,
पर उसकी खामोशियाँ भी बहुत कुछ कह जाती हैं।
लड़ती है, झगड़ती है, हक़ भी जताती है,
मगर हर हाल में मेरा साथ निभाती है।

सामने हो तो घर, घर सा लगता है,
उसके बिना हर कोना अधूरा सा लगता है।
कभी मेरी फ़िक्र में रातें भी जगा करती है,
और मेरी छोटी सी खुशी पर खुद मुस्कुरा करती है।

चाँद-तारों की ख्वाहिश नहीं रखती वो,
बस थोड़ा सा वक़्त और अपनापन चाहती है वो।
दो पल बैठकर उसकी बातें सुन लो अगर,
उसी में अपनी सारी दुनिया पाती है वो।

अच्छा लगता है जब साथ होती है वो,
ज़िंदगी की हर राह आसान करती है वो।
मेरे अधूरेपन को मुकम्मल कर जाती है,
पत्नी नहीं, मेरी दुनिया कहलाती है।

सोचता हूँ उनकी तारीफ़ में और क्या लिखा जाए...
हर शब्द छोटा पड़ जाए, ऐसा उनका साया है।
रब से बस इतनी दुआ है मेरी हर बार,
हर जन्म में वही मिले, यही सबसे बड़ा उपहार। ❤️

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