जाने किस पर आफत आई है, फिर से वो बन संवर कर निकली है।
दिखती है मासूम मगर वो जालिम है, ये महखाने मे हर आशिक़ कहता है।
शाम को कुछ खबर ही नही है, ये शहर रात क्या गुल खिलाता है।
मर गया जो कोई नजर की चाह में, वो जनाजा महखाना गुलज़ार करता हैं।
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