Gungunati Hawa (Hindi) गुनगुनाती हवा Poem by S.D. TIWARI

Gungunati Hawa (Hindi) गुनगुनाती हवा

गुनगुनाती हवा

चले झूम बलखाती, गुनगुनाती हवा।
दिल छूकर जुड़ाती, गुनगुनाती हवा।
सोये होते हैं झील, समुन्दर, नदी
उर्मियों को जगाती, गुनगुनाती हवा।
डोल पाते हैं आजाद, अम्बर में वो
बादलों को घुमाती, गुनगुनाती हवा।
खेले लपटों से ये, जैसे बच्चों का खेल
धधकाती बुझाती, गुनगुनाती हवा।
बांसों के झुरमुटों में, ये जाती है घुस
जा बांसुरी बजाती, गुनगुनाती हवा।
खिले होते हैं फूल, अति सुन्दर मगर
फैलाती सुगंध, गुनगुनाती हवा।
गाते होते विहंग, मधुर, बागों में गीत
कानों तक ले आती, गुनगुनाती हवा।
ऊँचा ध्वजा को, टांग देते जरूर
वह झंडा लहराती, गुनगुनाती हवा।
निकल जाती है घर से, कहीं सुंदरी
चुनर उसकी उड़ाती, गुनगुनाती हवा।
होता है कभी, बिगड़ जाता मिजाज
आंधियां लिये आती, गुनगुनाती हवा।

एस० डी० तिवारी

Saturday, October 15, 2016
Topic(s) of this poem: hindi,nature
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