Jindagi Kitana Badal Gayi Hai (Hindi) Poem by S.D. TIWARI

Jindagi Kitana Badal Gayi Hai (Hindi)

लगता है, हाथ से निकल गयी है।
जिंदगी तू कितना बदल गयी है।

समझ रही बिंदास हो गयी तू,
मशीनों की अब दास हो गयी तू।
निर्मूल की बातों के चक्कर में,
रहती बंधु, मित्रों के टक्कर में।
आडम्बर में खुद को छल गयी है। जिंदगी...

तन मन खुद आसक्त कर रही,
वातावरण विषाक्त कर रही।
टी. वी. फोन तक सिमट गयी तू,
भौतिकतावाद में लिपट गई तू।
बचपन तक को मसल गयी है। जिंदगी...

गुरु, श्रेष्ठ जनों से ज्ञान पा लेती,
सहज खा पीकर समय बिता लेती।
तू सादगी में लगती थी सुन्दर,
क्यों ढो रही सिर पे आडम्बर?
फैशन के लिए मचल गयी है। जिंदगी ...

आलस, रोग से दूर थी रहती।
प्रकृति प्रेम में चूर तू रहती।
सच्चाई से पड़ी है भटकी।
आपाधापी में रह गयी अटकी?
सुख-चैन खुद ही निगल गयी है। जिंदगी ...

चारों ओर से कांटे फंसाकर,
सुविधा की गाड़ी पर चढ़ा कर,
जिंदगी अब तू खींची जा रही,
फिर भी आँखें मिंची जा रही।
किस दलदल में फिसल गयी है! जिंदगी ….

स्वभाविक गति से चलती जा रही थी।
शान से आगे बढ़ती जा रही थी।
पड़ गयी तू, जाने किस दौड़ में!
शीघ्र पहुँचने की कहाँ, होड़ में!
छोटी हुई, आयु तेरी गल गयी है। जिंदगी …

एस डी तिवारी

Monday, August 15, 2022
Topic(s) of this poem: hindi
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This poem is about the life, how it has changed with time and technology.
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