Jo Hai Wo Shiv Hain Poem by Mukund Pathak

Jo Hai Wo Shiv Hain

जो हैं वो शिव हैं
जो नहींवो शिव हैं
तुममे शिव हैं, मुझमे शिव हैं

देखो खुद में झांक कर हम सबमे शिव हैं
शिव अनादी है शिव का न आरंभ है और न ही अंत

शिव तीनो लोको के स्वामी हैं
सृष्टी वो हैं जगत वो हैं, पृथ्वी वो हैं आकाश वो हैं

अंबर वो हैं गगन वो हैं, देखो तो पूरा ब्रम्भांड वो हैं
हे नीलकंठ हे त्रिपुरारी हे महाकालेश्वर हे गंगाधर हे चंद्रशेखर हे शिव हे शंकर हे शम्भू हे अदियोगी हे महादेव

मैं तीनो लोको के स्वामी के चरणों को नमन करता हु
तुमने जो ये जन्म दिया उसका मैं आभारी हूँ

तुमसे आया हु तुममे मिल जाऊ येही अभिलाषा है
बस तुमपर ही भरोशा है तुम ही मेरे आपने हो

ये सारा जग झूठा है ये सब मोह माया है
मुझे दर क्या होगा किसी का जब सर में महाकाल का साया है

हे भोले भंडारी मैंखुद को आपको समर्पित करता हु कृपा कर मेरे जीवन को धर्म के मार्ग पर चलने का राह दिखाए

खुद को आपसे मिलाने का उपाय बताये
जय भोले नाथ, जय शिव शम्भू

Jo Hai Wo Shiv Hain
Wednesday, May 22, 2019
Topic(s) of this poem: devotion
COMMENTS OF THE POEM
Harsh 22 May 2019

Om Namah Shivay Jai Mahakal Tene Lokon Ke Swami, Kalaspati ki is kavita ki paribha hi sab vyakt krti hai... bahut acche namaskar

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