milap singh


Ladki Ki Jindgi - Poem by milap singh

करका तों सीनका
करका तों हिण्ड
इस समाजा मंज
कुली री के हा जींद

जम्दे मापे दुःख म्नांदे
कुली बेचारी जो
घटिया स्कूला मंज पढांदे

बेचारी जहने भी घरा तों
बाहर नकेंदी
इस समाजा रे कतुने ही
दुखड़े सेंदी

बचदी-बचांदी
सो जे बस्सा माँ पुज्दी
तेठी भी समाजा री
कई हरकता हुज्दी

इस समाजा मा
कुली री के हा जींद
मापे -हौरे सबी जो चिंद

ऐ! दोगले मनुओ
कुदरत जो समझा
इस समाजा मा फैली
गंदी सोचा जो बदला

ऐ कुली भी समाजा रा
हिस्सा ही हा
गबरू तौं बगैर कजो तुसू जो
कुस दुस्दा ही ना

असे भी सब कुस
क्र सकदी हिन
गबरू रे बराबर पड़-लिख
सकदी हिन

तुसे निचिंदे रेहा
ना समझौता रखा
बस अपनी कुली री काबिलियता पुर
भरोसा रखा
Milap Singh Bharmouri


Poet's Notes about The Poem

samaj me ek aam ladki ki jindgi ko darshati ye kavita milap singh bharmouri dawara gaddi boli me likhi gayi hai.gaddi boli ko bhrarmouri boli ke nam se bhi jana jata hai.

Comments about Ladki Ki Jindgi by milap singh

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Friday, February 15, 2013



[Report Error]