मैं (Me) Poem by Kavita Kilam

मैं (Me)

Rating: 4.5

उस सूखे पत्ते की तरह हूँ मैं
जो खिलना चाहता है पर खिल नहीं सकता|
चला जा रहा है दुनिया की भीड़ में
रुकना चाहता है पर रुक नहीं सकता|
आते हैं पत्थर भी, आते हैं काँटे भी
पार करना चाहता है पर कर नहीं सकता|
कैसे नकारुं उसे, जो प्रत्यक्ष है उसे
जो देखा ही नहीं, उसे अनदेखा नहीं कर सकता |
मंजिल दिखती है सामने, पर लगती फिर दूर है
पर है तो आखिर मंजिल ही, उससे मुंह मोड़ नहीं सकता|
क्या ढूँढता है यह मन, किसकी इसे तलाश है
जो चाहता है, वो इसे कभी मिल नहीं सकता|
अपने बन के जो बैठे हैं, परायेपन की मूरत हैं
अपनाना चाहता हूँ जिन्हें, उन्हें अपना नहीं सकता|
चलते जाना हैं, थकना नहीं है मुझे
जो तूफ़ान है अन्दर, ' कवि' वो अब थम नहींसकता||
- कवि

Thursday, March 17, 2016
Topic(s) of this poem: myself
COMMENTS OF THE POEM
Balkrishan Dhar 20 March 2016

very nice and very true..

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