उस सूखे पत्ते की तरह हूँ मैं
जो खिलना चाहता है पर खिल नहीं सकता|
चला जा रहा है दुनिया की भीड़ में
रुकना चाहता है पर रुक नहीं सकता|
आते हैं पत्थर भी, आते हैं काँटे भी
पार करना चाहता है पर कर नहीं सकता|
कैसे नकारुं उसे, जो प्रत्यक्ष है उसे
जो देखा ही नहीं, उसे अनदेखा नहीं कर सकता |
मंजिल दिखती है सामने, पर लगती फिर दूर है
पर है तो आखिर मंजिल ही, उससे मुंह मोड़ नहीं सकता|
क्या ढूँढता है यह मन, किसकी इसे तलाश है
जो चाहता है, वो इसे कभी मिल नहीं सकता|
अपने बन के जो बैठे हैं, परायेपन की मूरत हैं
अपनाना चाहता हूँ जिन्हें, उन्हें अपना नहीं सकता|
चलते जाना हैं, थकना नहीं है मुझे
जो तूफ़ान है अन्दर, ' कवि' वो अब थम नहींसकता||
- कवि
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
very nice and very true..