एक सुहानी सुबह Poem by Neha jain

एक सुहानी सुबह

धुँधली सी सुबह,
सुहानी सी रात|
यही तो है वो समा,
जब बहते है जज़्बात|
लगता है ऐसा जैसे बादल कर रहे है
गुप् चुप कुछ बात|

सूरज और धूप भी कहीं दूर,
करने गए है मुलाकात|
रिमझिम ओस की बूँदों सा
नम है हर पल |
जैसे नई सुबह की तैयारी में,
व्यस्त है हर शण

ये रजाई की गर्माहट,
ये चाय की महक,
ये हलवे का स्वाद,
ये गुड की मिठास,
समा बदल जाने पर,
नहीं आयेगा रास|

ये हमसफर का साथ,
ये हाथों में हाथ,
ये लंबी सी बात,
ये बढ़ती सी रात,
आज बहने दो,
मत रोको ये बहते जज़्बात|

क्यों न भुला दे,
क्या होगा आगे,
क्यों करे समा बदलने का इंतज़ार,
खो क्यों न जाओ,
आज इसी में यार|
यही तो है दर्खास्त,
इस वक़्त की सरकार|

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