मेरा घर था Poem by Priya Singh

मेरा घर था

दुनियां से
रुसवाई जब भी मिली
मैने पुकारा उसे

डर था खोने का
खुद को जैसे

कई बार
कहा जाने को
पर हर बार
ठहर गया
मुझमें कहीं वो

मैं जीती थी
उसमे सांस
बसती थी मेरी

मेरी रूह का
बसर था
क्या बताऊं
किसको कैसे बताऊं

वो एक शख्स
मेरा घर था।

© प्रिया सिंह

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