कान्हा! बस तुम्हे समर्पित यह क्रंदन Poem by Puneet Singh

कान्हा! बस तुम्हे समर्पित यह क्रंदन

कृष्ण की मुस्कान वह समर के आरब्ध पर
आज क्यों अस्पष्ट है आख्यान वो प्रारब्ध पर?
अधीरता से देखता हूं सृष्टि परावार को
नैकशेय बुद्ध हो घूमते हैं समष्टि के उपकार को
धर्म था की त्यज्य था निजप्राण भी कारूण्य पर
सम्राट ही अब तोड़ते हैं साम्राज्य के आधार को।
मदांधता कि प्राचीर पर, धृष्टता की है पताका,
कुरु हुए हैं राट और मातुल बने हैं न्यायदाता।
अनायसंगत ‘न्याय' हैं और कुंठित तर्क हैं।
कूपमंडूक विद्वता है या यह है नपुंसक दासता?
धर्मसंकट है विकट, यह धर्म ही संकट में है
राजृषियों की इस सभा में अब सत्य का संबल नहीं है
अधर्मियों और कुकर्मियों के वर्ग कई हैं बस रहे…
यदि नहीं है…
तो पंथों से कटकर मरी इस मनुष्यता का दल नहीं है
निकृष्ठता के यज्ञ में देते आहुति निज प्राण की
मनुष्य ही को मार दे, यह दर्शनों का तल नहीं है।
इस व्यूह का कोई हल नहीं है
द्यूत खेल है अब छल नहीं है
जल रहा संसार सारा
बस तृष्णता है, जल नहीं है।
दृश्यता एक कल्पना है, अदृश्य हूं हर श्वास में
भाग्यरश्मि ढूंढता हूं पश्चिमी आवास में
पूर्ण का परिचित मगर शून्यता पहचान है
निस्तेज सी निष्प्राण देह, निःशब्द सा एक गान है,
भूमि का अपमान मैं कुछ पुरुष यह व्यवधान है,
रिक्त मन देखता यह शक्ति का अवसान है।
निज देह में निःस्तब्धता, अश्रुपूरित, विवर्ण सा
आग्नेय मैं, एक पितृद्रोही! हेमंत के एक पर्ण सा।
इंद्र का अधिकार वह महासिंधु का मह ज्वार भी,
कर्म की विपरीत धारा, बंद होते द्वार भी,
दर्मज्ञ दृष्टा देखता है बच रहा बस द्वेष है
क्रोध बन कर्तव्य सा, एक क्रंदित आवेश है।
चैतन्य की एक डोर थामे, अनभिज्ञ था मैं दंभ से,
साक्षी हां रहा किंतु तिमिर का आरंभ से।
नीचता की बात करते, ये मन तुम्हारे नीच हैं
यम के आवरण में ढके पर वासना के बीच हैं
धर्म बस है यही की भेद ही अन्याय है।
कामुकता और भ्रांतियाँ सब अंतःकरण में बीज हैं-
एक रक्तिम निर्झरी में डूबते अवरोध के,
धर्म के आह्वान पर जलकांत के उस क्रोध के,
रूदन के, मृत्यु के और अंतरिम प्रतिशोध के,
शत्रु बने हैं आज जो उस मर चुके न्यवग्रोध के।
कोई आश्रित है नहीं और कोई किसी पर ‘सर' नहीं है।
दृष्टा जो थे सत्य तो फिर कोई भी तो ‘पर' नहीं है।
आज समर अंतर्निहित है और कौरव निज विचार,
जो अनुज के प्राण साधे, सर्प है वो, नर नहीं है।
अप्लज्ञानियों की धृष्टता का भला कोई अंत था?
अरे! यातना जो थी सनातन तो सनातन संत था।
विनम्रता और सौम्यता का हि तो तन निमित्त है
है शील, धीरज, संतोष, प्रेम तो सनातन चित्त है।
विवेक का वह प्रज्वलन,
घेरे आशंकित मेघ सघन,
कान्हा! बस तुम्हे समर्पित यह क्रंदन

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