अगर तुम मुझे भूल जाओ,
तो ये मत समझना
कि मैं टूट जाऊँगा—
मैं बस
खामोशी की तरफ़
चला जाऊँगा।
मैं तुम्हारे नाम को
बारिश की तरह
हर रोज़ नहीं बरसाऊँगा,
मैं तुम्हारी याद को
दीये की तरह
हर रोज़ नहीं जलाऊँगा।
क्योंकि प्रेम
भीख नहीं है,
और मैं
अपनी आत्मा को
किसी के "कभी" पर
टिका नहीं सकता।
अगर तुम मुझे भूल जाओ,
तो मेरी सांसें
तुम्हारे बिना भी
चलेंगी—
मगर अब
वे तुम्हारे लिए
रुकेंगी नहीं।
मैं तुम्हारे लौटने की
राह नहीं देखूँगा,
मैं सिर्फ़
अपनी राह देखूँगा।
लेकिन सुनो—
अगर किसी दिन
तुम्हारे भीतर
वही पुरानी रोशनी जागे,
अगर तुम्हें अचानक
याद आए कि
मैंने तुम्हें
कितना सच चाहा था…
और तुम लौट आओ,
तो मैं
पत्थर नहीं रहूँगा।
मैं अपने दरवाज़े पर
काँटा नहीं उगाऊँगा,
मैं तुम्हारी परछाईं पर
सज़ा नहीं लिखूँगा।
मैं बस
तुम्हें देखूँगा—
और पूछूँगा:
"क्या अब भी
तुम्हारे भीतर
वही दिल है? "
क्योंकि
मैं प्रेम को
ज़िद नहीं बनाता,
मैं प्रेम को
सम्मान बनाता हूँ।
हाँ—
अगर तुम मुझे भूल जाओ,
तो मैं भी
अपने भीतर तुम्हें
धीरे-धीरे
खो दूँगा।
और अगर तुम मुझे
याद रखोगे,
तो मैं
हर सांस में
तुम्हारा नाम नहीं,
पर हर सांस में
तुम्हारा एहसास
ज़रूर रखूँगा।
— पुष्प सिरोही
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