एक मोड़ था जीवन का,
जहाँ राहें दो नहीं—
हज़ार थीं…
और हर रास्ता
अपनी कीमत माँगता था।
एक राह चमकती थी
लोगों की तालियों से,
दूसरी राह
खामोश थी—
बस भीतर की आवाज़ से भरी हुई।
मैंने देखा—
भीड़ जिस रास्ते पर थी,
वहाँ मंज़िलें सस्ती थीं,
पर आत्मा महँगी पड़ती थी।
और जो राह सुनसान थी,
वहाँ डर बहुत थे,
पर सच का उजाला
सबसे तेज़ था।
मैं रुका…
बहुत देर रुका,
क्योंकि मैं समझ गया—
गलत रास्ता चुनकर
आदमी जल्दी पहुँच सकता है,
पर सही रास्ता चुनकर
आदमी सही बनता है।
मैंने वो राह चुनी
जिस पर मेरे कदमों के
निशान पहले नहीं थे—
और जब-जब थकान आई,
मैंने खुद से कहा—
"यही तो कारण है
कि ये राह मेरी है।"
आज जब पीछे देखता हूँ,
तो समझ आता है—
कभी-कभी
ज़िंदगी बदलती नहीं,
बस हम बदल जाते हैं…
एक साहसी फैसले के बाद।
और सच कहूँ—
मुझे उस मोड़ पर
कोई पछतावा नहीं,
क्योंकि मैंने
राह नहीं चुनी थी…
मैंने
अपनी पहचान चुनी थी।— पुष्प सिरोही
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