मेरे दोस्तों,
दुश्मन
हमेशा बाहर नहीं होते—
कभी-कभी
वो हमारे भीतर
धीरे-धीरे बनते हैं।
वे चेहरों में नहीं,
आदतों में पलते हैं।
वे तलवार नहीं उठाते—
वे
हमारी सोच में
दरार डालते हैं।
एक दुश्मन
डर बनकर आता है—
और कहता है,
"तुमसे नहीं होगा।"
एक दुश्मन
टालमटोल बनकर आता है—
और कहता है,
"कल कर लेना।"
एक दुश्मन
ग़लत संगत बनकर आता है—
और कहता है,
"चलो, छोड़ो… इतना मत सोचो।"
और कुछ दुश्मन
इतने शरीफ़ होते हैं
कि पहचान में नहीं आते।
वे
"भलाई" के नाम पर
तुम्हें रोकते हैं,
"सलाह" के नाम पर
तुम्हें तोड़ते हैं,
"अपनापन" दिखाकर
तुम्हारी उड़ान
काटते हैं।
दुश्मन
कभी-कभी
वो भी होता है
जो तुम्हें
उतना ही रखना चाहता है
जितना
उसकी सुविधा में हो।
जो तुम्हारी रोशनी से
प्यार नहीं करता—
बस
तुम्हारी परछाईं से
सुरक्षित महसूस करता है।
मैंने देखा है—
दुश्मन
चीखता नहीं,
वो धीरे-धीरे
धक्का देता है।
पहले
तुम्हारे आत्मविश्वास को,
फिर
तुम्हारे फैसलों को,
फिर
तुम्हारी उम्मीद को।
और फिर
तुम एक दिन
खुद से पूछते हो—
"मैं पहले जैसा क्यों नहीं रहा? "
और तुम्हें पता भी नहीं चलता
कि तुम्हें चोट
किसी हथियार ने नहीं,
किसी जहर ने नहीं—
किसी छोटी-सी बात ने दी थी
जो रोज़
दोहराई जाती रही।
पर सुनो…
सबसे खतरनाक दुश्मन
वो नहीं
जो बाहर बैठा है।
सबसे खतरनाक दुश्मन
वो है
जो तुम्हारे भीतर बैठकर
तुम्हें ही
तुमसे दूर कर देता है।
मैंने इसलिए
अपने दुश्मनों की सूची बदली है।
अब मेरे दुश्मन—
वो लोग नहीं
जो मुझे पसंद नहीं करते,
मेरे दुश्मन हैं—
मेरी कमजोरी,
मेरी जल्दबाज़ी,
मेरी चुप्पी,
और मेरा वो "कम्प्रोमाइज़"
जो हर बार
मेरे आत्मसम्मान को
कम कर देता है।
और मैं उनसे
लड़ता हूँ।
हर सुबह
जब मन कहता है
"रुक जा, "
मैं एक कदम आगे बढ़ता हूँ।
जब डर कहता है
"मत कर, "
मैं कोशिश करता हूँ।
जब आलस कहता है
"छोड़ दे, "
मैं शुरू कर देता हूँ।
क्योंकि
दुश्मन को हराने का
सबसे बड़ा तरीका
ये नहीं कि
उसे मार दो—
सबसे बड़ा तरीका ये है
कि तुम
खुद को बचा लो।
और जब तुम
अपने भीतर के दुश्मनों को
हरा दोगे,
तो बाहर के दुश्मन
खुद-ब-खुद
छोटे पड़ जाएँगे।
मेरे दोस्तों,
दुश्मन मिलेंगे,
हर मोड़ पर मिलेंगे—
पर जीत
उनकी नहीं होती
जो दुश्मनों को गिनते हैं…
जीत
उनकी होती है
जो खुद को
अजेय बना लेते हैं।
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem