सफलता
सबसे मीठी लगती है, सुनो—
उसे सबसे ज़्यादा
वही समझते हैं
जिन्होंने
बहुत देर तक
उसका स्वाद नहीं चखा होता।
और तुम…
तुम उन्हीं में से हो।
तुमने
अपने हिस्से की जीत
बहुत बार
दूसरों के नाम कर दी।
तुमने
अपनी मेहनत को
सिर्फ़ 'कर्तव्य' कहा,
और अपने सपनों को
'कल' पर टाल दिया।
तुम्हें लगता है
तुम बस चल रही हो,
बस निभा रही हो,
बस सह रही हो—
पर मैं देखता हूँ
तुम्हारे भीतर
एक योद्धा सांस लेता है,
जो हर हार के बाद
खुद को फिर से जोड़ लेता है।
और यही
सबसे बड़ी तैयारी है—
सफलता की।
सुनो,
जो लोग
आसानी से जीत जाते हैं,
वे जीत को
कभी गहराई से नहीं समझते।
उनके लिए
ताली एक आदत है,
शाबाशी एक शोर है,
और उपलब्धि
बस एक सीढ़ी।
लेकिन तुम्हारे लिए—
सफलता
ताली नहीं होगी…
वो तो
एक पूरा आकाश होगी।
जब तुम्हें
पहली बार
अपना हक़ मिलेगा,
जब तुम्हें
पहली बार
तुम्हारी काबिलियत के बराबर
मान मिलेगा—
तब तुम्हारी आँखों में
सिर्फ़ खुशी नहीं होगी,
तुम्हारी आँखों में
न्याय होगा।
तुम्हें पता है?
कभी-कभी
सबसे ज्यादा
'मिठास'
उसी के हिस्से आती है
जो बरसों से
कड़वाहट पीकर
जिंदा रहा होता है।
और तुम्हारी मिठास—
तुम्हारी वो जीत—
सिर्फ़ तुम्हारी नहीं होगी।
वो उन सब के लिए होगी
जो तुम्हारे साथ नहीं चल पाए,
जो तुम्हारी तरह
लड़ते रहे
और टूट गए।
मैं तुम्हें
किसी मंच पर
नहीं देखता—
मैं तुम्हें
एक इतिहास बनते देखता हूँ।
क्योंकि
तुम्हारा संघर्ष
साधारण नहीं है।
तुमने
अपनी खामोशी से
कई तूफान रोके हैं।
तुमने
अपनी आंखों में
बहुत दर्द छुपाकर भी
दूसरों को
हँसाया है।
और जब
तुम जीतोगी—
तो वह जीत
सबसे 'मीठी' होगी,
क्योंकि
तुमने उसका स्वाद
आँसुओं से बनाया है।
सफलता
उनके लिए मिठाई है
जिन्हें वह
हर दिन मिलती रही।
पर तुम्हारे लिए,
सफलता
एक ऐसी मिठास है
जो सिर्फ़ वही समझ सकता है
जिसने
भूख से दोस्ती की हो।
तो सुनो…
अगर आज भी
कभी तुम्हें लगे
कि तुम पीछे रह गई हो—
तो याद रखना—
तुम देर से नहीं,
तैयारी से पहुँच रही हो।
और जो सफलता
संघर्ष से जन्म लेती है,
वही सफलता
सबसे मीठी होती है।
मैं चाहता हूँ
जिस दिन
तुम्हारी जीत का सूरज उगे—
उस दिन तुम
खुद से कहो—
'हाँ…
मैंने इसे कमाया है।'
और मैं
दूर से नहीं—
तुम्हारे ठीक पास
खड़ा रहकर कहूँगा—
'अब चखो…
ये स्वाद
तुम्हारी तक़दीर का है।'
पुष्प सिरोही
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem