स्वयं पर विजय Poem by Pushp Sirohi

स्वयं पर विजय

जो दुनिया जीतने निकले थे,
वे अक्सर खुद से हार गए,
पर जिसने अपने भीतर के युद्ध
शांति से पार किए—
वही सच्चा विजेता कहलाया।

स्वयं पर विजय आसान नहीं,
यह तलवार नहीं—
यह धैर्य का कवच है,
यह चीख नहीं—
यह मौन का साहस है।

जब क्रोध उफनता है,
और शब्द बाण बनकर निकलते हैं,
तब अपने होंठों पर पहरा देना—
यही पहला शौर्य है।

जब मन कहे "छोड़ दे",
और थकान कहे "रुक जा",
तब अपने कदमों से कहना—
"एक कदम और…"
यही दूसरा शौर्य है।

जब प्रशंसा सिर चढ़कर बोले,
और अहंकार भीतर सिंहासन मांगे,
तब अपने भीतर झांककर कहना—
"मैं मिट्टी हूँ…"
यही तीसरा शौर्य है।

जब अपमान के काँटे
आँखों में उतरने लगें,
तब बदले की आग बुझाकर
संयम का जल पी लेना—
यही चौथा शौर्य है।

जो सपने सच्चे हों,
वे शोर नहीं करते,
वे रोज़ के कर्म में
धीरे-धीरे ढलते हैं—
और एक दिन इतिहास बन जाते हैं।

इसलिए सपने देखो,
मगर सपनों के पीछे खुद को मत खोना,
लक्ष्य रखो,
मगर लक्ष्य के लिए इंसानियत मत छोड़ना।

हर दिन एक परीक्षा है—
जहाँ प्रश्न बाहर से नहीं,
भीतर से पूछे जाते हैं:
क्या तुम वही करोगे
जो सही है?
या वही जो आसान है?

और जीत वहाँ नहीं होती
जहाँ भीड़ तालियाँ बजाए,
जीत वहाँ होती है
जहाँ मन कहे—
"आज मैंने खुद को संभाल लिया।"

क्योंकि असली वीर
वह नहीं जो दुनिया को झुका दे,
असली वीर वह है
जो स्वयं को झुका न दे।

जो अपनी भूख को नियम दे,
जो अपने डर को नाम दे,
जो अपने दर्द को अर्थ दे,
और अपने कर्म को धर्म बना ले।

और जब जीवन कहे—
"अब थक जाओ…"
तब भी तुम्हारी इच्छाशक्ति बोले—
"स्वयं पर विजय बाकी है! "

यही वह जीत है
जो कभी हारती नहीं…
यही वह विजय है
जो तुम्हें
मनुष्य से महान बनाती है। - पुष्प सिरोही

स्वयं पर विजय
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