जो अमर हो गए Poem by Pushp Sirohi

जो अमर हो गए

वे मरे नहीं,
वे अमर हो गए।
जो तिरंगे में लिपटकर
मिट्टी से एक हो गए।

उनकी साँसें थमीं नहीं,
वे हवाओं में घुल गईं।
सीमा पर जो गिर पड़े,
वे भारत की नींव बन गईं।

किसी ने माँ का आँचल छोड़ा,
किसी ने बेटे का हाथ।
किसी ने पत्नी की चूड़ियाँ,
किसी ने अधूरी रह गई बात।

पर जब देश ने पुकारा,
तो किसी ने सवाल न किया।
"मेरे बाद क्या होगा? "
यह विचार तक न किया।

वे चले गए मुस्कान लेकर,
सीने पर तिरंगा तान।
गोली से पहले निकला था
"भारत माता" का नाम।

वीरांगनाएँ भी पीछे नहीं,
उन्होंने भी इतिहास रचा।
किसी ने सुहाग अर्पित किया,
किसी ने बेटा राष्ट्र को सौंपा।

आँसू उन्होंने भी पिए होंगे,
रातों में रोई होंगी।
पर सुबह जब तिरंगा देखा,
तो रीढ़ सीधी हुई होंगी।

यह त्याग कोई कहानी नहीं,
यह हर दिन का सच है।
हम जिस चैन से सोते हैं,
उसके पीछे उनका रक्त है।

अगर आज भारत खड़ा है,
तो उनके कंधों पर खड़ा है।
अगर आज हम बोल पाते हैं,
तो उनकी चुप्पी ने रास्ता दिया है।

उनसे देश ने बहुत कुछ लिया,
पर बदले में कुछ न दिया।
न कोई वादा, न कोई सौदा—
बस अमरता दे दी।

जब भी तिरंगा लहराए,
तो बस इतना याद रखना—
यह कपड़ा नहीं,
किसी का पूरा जीवन है।

वे शहीद नहीं कहलाते,
वे राष्ट्र की आत्मा हैं।
वे सैनिक नहीं,
भारत की साँस हैं।

आज अगर दिल में भारत धड़कता है,
तो वह उन्हीं की देन है।
हम ज़िंदा हैं—
क्योंकि कोई
मुस्कुराकर मर गया था।
— पुष्प सिरोही 🇮🇳

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
कविता: "जो अमर हो गए" — भावार्थ / नोट यह कविता शहीदों, सैनिकों और वीरांगनाओं के त्याग, मौन साहस और सर्वोच्च समर्पण को नमन है। यह उन लोगों की कथा है जो इतिहास के पन्नों में कम, पर राष्ट्र की नींव में अधिक जीवित रहते हैं। कविता यह स्मरण कराती है कि हम जिस स्वतंत्रता, शांति और सम्मान में जीते हैं, वह सहज नहीं— वह किसी के अधूरे सपनों, किसी की सूनी आँखों और किसी की मुस्कुराती हुई अंतिम साँस की देन है। यह रचना शौर्य को शोर में नहीं, मौन बलिदान में देखती है। यह बताती है कि सच्चा सैनिक मरने से नहीं, कर्तव्य से पहचाना जाता है। वीरांगनाओं का उल्लेख इस कविता को पूर्ण बनाता है— क्योंकि राष्ट्र केवल सीमा पर नहीं, घर के भीतर भी संघर्ष और धैर्य से सुरक्षित रहता है। यह कविता आँखें नम करती है, पर रीढ़ सीधी रखती है— क्योंकि शोक नहीं, गौरव इसका अंतिम भाव है। समर्पण समर्पित: मेरे पिता — Ex Army Major श्री एस. पी. एस. सिरोही यह कविता मेरे पिता Ex Army Major श्री एस. पी. एस. सिरोही को सादर समर्पित है। वे केवल सेना के अधिकारी नहीं थे, वे मेरे लिए अनुशासन, साहस और राष्ट्रभक्ति की जीवित परिभाषा थे। उनकी वर्दी मेरे घर में केवल कपड़ा नहीं थी— वह मूल्य थी, कर्तव्य थी, और मौन गर्व थी। उन्होंने मुझे सिखाया कि देशभक्ति शब्दों में नहीं, निर्णयों में दिखाई देती है। कि राष्ट्र के लिए जीना तालियों से नहीं, त्याग से मापा जाता है। इस कविता में जो सम्मान, जो गर्व और जो मौन श्रद्धा है— वह मेरे पिता की सेवा, संस्कार और जीवन-दृष्टि की ही प्रतिध्वनि है। यह रचना उन सभी शहीदों को नमन है, और मेरे पिता को एक पुत्र का गर्वपूर्ण प्रणाम। — पुष्प सिरोही 🇮🇳
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