वे मरे नहीं,
वे अमर हो गए।
जो तिरंगे में लिपटकर
मिट्टी से एक हो गए।
उनकी साँसें थमीं नहीं,
वे हवाओं में घुल गईं।
सीमा पर जो गिर पड़े,
वे भारत की नींव बन गईं।
किसी ने माँ का आँचल छोड़ा,
किसी ने बेटे का हाथ।
किसी ने पत्नी की चूड़ियाँ,
किसी ने अधूरी रह गई बात।
पर जब देश ने पुकारा,
तो किसी ने सवाल न किया।
"मेरे बाद क्या होगा? "
यह विचार तक न किया।
वे चले गए मुस्कान लेकर,
सीने पर तिरंगा तान।
गोली से पहले निकला था
"भारत माता" का नाम।
वीरांगनाएँ भी पीछे नहीं,
उन्होंने भी इतिहास रचा।
किसी ने सुहाग अर्पित किया,
किसी ने बेटा राष्ट्र को सौंपा।
आँसू उन्होंने भी पिए होंगे,
रातों में रोई होंगी।
पर सुबह जब तिरंगा देखा,
तो रीढ़ सीधी हुई होंगी।
यह त्याग कोई कहानी नहीं,
यह हर दिन का सच है।
हम जिस चैन से सोते हैं,
उसके पीछे उनका रक्त है।
अगर आज भारत खड़ा है,
तो उनके कंधों पर खड़ा है।
अगर आज हम बोल पाते हैं,
तो उनकी चुप्पी ने रास्ता दिया है।
उनसे देश ने बहुत कुछ लिया,
पर बदले में कुछ न दिया।
न कोई वादा, न कोई सौदा—
बस अमरता दे दी।
जब भी तिरंगा लहराए,
तो बस इतना याद रखना—
यह कपड़ा नहीं,
किसी का पूरा जीवन है।
वे शहीद नहीं कहलाते,
वे राष्ट्र की आत्मा हैं।
वे सैनिक नहीं,
भारत की साँस हैं।
आज अगर दिल में भारत धड़कता है,
तो वह उन्हीं की देन है।
हम ज़िंदा हैं—
क्योंकि कोई
मुस्कुराकर मर गया था।
— पुष्प सिरोही 🇮🇳
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