"जब तुम बूढ़ी हो जाओगी" Poem by Pushp Sirohi

"जब तुम बूढ़ी हो जाओगी"

जब तुम बूढ़ी हो जाओगी—
और शामें तुम्हारे बालों में
चाँदी की लकीरें लिख देंगी,
जब आईने के सामने
तुम्हारी आँखें
धीरे-धीरे थकने लगेंगी…

तब किसी अलमारी के कोने से
एक पुरानी याद निकालना,
किसी पुराने खत की तरह—
उसमें मेरी आवाज़ होगी,
और तुम्हारी हँसी का
वही पहला उजाला होगा।

तुम आग के पास बैठोगी,
थोड़ी धीमी सांसों के साथ,
और सोचोगी—
कितनी बार किसी ने
तुम्हारे चेहरे को चाहा था,
कितनी बार लोगों ने
तुम्हारी मुस्कान की पूजा की थी,
पर बहुत कम लोग थे
जो तुम्हारी खामोशी तक पहुँचे।

बहुत से लोग आए थे
तुम्हारी रौशनी के दीवाने बनकर,
पर एक मैं था
जो तुम्हारे भीतर के सच से प्रेम करता था—
तुम्हारे दुखों से,
तुम्हारी टूटन से,
तुम्हारी अपूर्णता से भी।

तुम्हारी आँखों में
जो हल्की-सी उदासी रहती थी,
मैंने उसे भी प्यार किया,
क्योंकि वही उदासी
तुम्हारी आत्मा को
सबसे सुंदर बनाती थी।

और जब जीवन की भीड़
एक दिन पीछे छूट जाएगी,
जब नाम कम बोलेंगे,
और तस्वीरें ज़्यादा बोलेंगी—
तब तुम जानोगी
कि प्रेम क्या होता है…

प्रेम—
जो उम्र से नहीं डरता,
जो चेहरा बदलने पर भी
दिल की भाषा नहीं बदलता,
जो हाथों की लकीरों से नहीं,
रूह की लकीरों से जुड़ता है।

और अगर उस वक़्त
तुम खिड़की के पास जाकर
धीरे से मुस्कुरा दो,
तो समझ लेना—
कहीं दूर,
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
मैं आज भी
उसी तरह ज़िंदा हूँ।

क्योंकि सच्चा प्रेम
पास रहने का नाम नहीं,
सच्चा प्रेम तो
वक़्त के पार भी
तुम्हारे नाम को
दुआ बना लेना है।

— पुष्प सिरोही

"जब तुम बूढ़ी हो जाओगी"
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