उदासी की धुन Poem by Pushp Sirohi

उदासी की धुन

उदासी जब आए—
तो उसे भगाना मत,
उसे ज़हर समझकर
अपनी रगों से
धक्का मत देना।

क्योंकि उदासी
कोई दुश्मन नहीं—
वो खुशी की
काली परछाईं है,
जो रोशनी के पीछे-पीछे
चलती रहती है।

जब मन भारी हो—
तो अंधेरे में
अपने आप को
कब्र मत बना लेना।
नींद के नाम पर
खुद को मिटा मत देना,
क्योंकि कुछ रातें
सोकर नहीं—
जागकर कटती हैं।

बल्कि—
एक गुलाब तोड़ो,
और उसकी खुशबू में
अपने दुख को
धीरे-धीरे घुलने दो।

काँटे भी देखना—
क्योंकि अक्सर
सबसे सुंदर फूल
सबसे ज्यादा
चुभते हैं।

बारिश की पहली बूंद
हथेली पर गिरने दो,
और सुनो—
पानी का रोना भी
कभी-कभी
दुआ जैसा लगता है।

पीपल के पत्ते की थरथराहट में
अपना काँपता दिल रख दो,
क्योंकि प्रकृति
दुख को
शब्द नहीं—
धुन बनाकर समझती है।

और अगर
तुम्हारी आँखों में
नमी उतर आए—
तो शर्म मत करना,
ये आँसू
कमज़ोरी नहीं—
रूह की सबसे सच्ची
गवाही हैं।

उदासी की गोद में
एक डरावना-सा सौंदर्य होता है—
क्योंकि
जो फूल सबसे सुंदर होता है
वो सबसे पहले
मुरझाना भी जानता है।

खुशी—
बहुत तेज़ धूप है,
और उदासी—
वही धूप
जब बादल बनकर
नरम पड़ जाती है।

याद रखो—
जो सबसे मीठी हँसी है,
उसके भीतर
सबसे गहरी चीख
छुपी होती है।

और जो प्रेम
सच में उजला होता है,
वो विरह की राख से होकर
हीरे जैसा
चमकता है।

उदासी को समझो—
वो तुम्हें
जीवन की सबसे बड़ी बात सिखाती है:
कि सुंदरता
हमेशा टिकती नहीं…
और यही सच
उसकी कीमत बढ़ा देता है।

इसलिए
उदासी के पास बैठो—
उसका हाथ पकड़ो,
क्योंकि
वो तुम्हें तोड़ती नहीं—
वो तुम्हें
अंदर से सच्चा बनाती है।

और जब वह जाए—
तो
उसके जाने का दर्द ही
तुम्हें यह भरोसा देगा
कि तुमने
किसी चीज़ को
पूरी गहराई से
जिया था।

— पुष्प सिरोही

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