ताक़त Poem by Pushp Sirohi

ताक़त

ताक़त—
वो नहीं
जो हथियार उठाए,
ताक़त वो है
जो सच उठाए।

मैंने शहरों को देखा है—
जहाँ कानून
कागज़ पर न्याय लिखता है,
और सड़कों पर
खामोशी
लहू पोछती है।

मैंने देखा है
कैसे झूठ
सूट पहन लेता है,
कैसे अपराध
"प्रक्रिया" बन जाता है,
और कैसे एक मासूम का दर्द
"फाइल नंबर" में बदल दिया जाता है।

ताक़त—
वो नहीं
जो आवाज़ दबा दे,
ताक़त वो है
जो दबकर भी
बोल दे।

कभी-कभी
मुझे लगता है
मेरा गुस्सा
समुद्र नहीं—
ज्वालामुखी है।
पर मैं सीख रहा हूँ—
गुस्से को
आग मत बनाओ
जो सब जला दे,
उसे मशाल बनाओ
जो रास्ता दिखा दे।

क्योंकि असली ताक़त
हाथों में नहीं,
कशेरुका में होती है—
वो सीधी रीढ़
जो झुकने से मना कर दे।

मुझे पता है
जब मैं सच कहता हूँ
तो लोग असहज होते हैं,
क्योंकि उनकी शांति
किसी और के शोक पर टिकी होती है।

ये दुनिया
"शालीन" रहना सिखाती है—
मत बोलो,
मत पूछो,
मत लड़ो…
पर मैंने देखा है
शालीनता के भीतर
कितनी लाशें छुपी हैं।

ताक़त का सबसे बड़ा दुश्मन
डर नहीं—
आदत है।
वो आदत
जो अन्याय को
रोज़ का मौसम बना देती है।

मैं उस आदत को
तोड़ना चाहता हूँ।
मैं चाहता हूँ
लोग सच से डरें नहीं,
झूठ से डरें।

क्योंकि
जब सिस्टम
किसी एक को कुचलता है,
तो वो सिर्फ़ एक आदमी नहीं—
आने वाला कल कुचला जाता है।

और इसलिए
मैं बोलता हूँ।
मैं लिखता हूँ।
मैं खड़ा होता हूँ।

ताक़त—
वो नहीं
जो किसी को चुप कराए,
ताक़त वो है
जो किसी को
सुनने पर मजबूर कर दे।

मैंने तय किया है—
मैं अपनी आवाज़
किसी कीमत पर
बेचूँगा नहीं।
क्योंकि मेरी आवाज़
मेरा हथियार नहीं—
मेरा धर्म है।

और अगर
सच बोलने की कीमत
मुझे अकेला कर दे—
तो भी ठीक।
क्योंकि इतिहास
भीड़ से नहीं—
अकेले सच से बनता है।

— पुष्प सिरोही

ताक़त
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