तुम मेरे अंदर रहती हो Poem by Pushp Sirohi

तुम मेरे अंदर रहती हो

तुम मेरे अंदर रहती हो—
(हाँ, मेरे ही दिल के भीतर)
इसलिए मैं जहाँ भी जाता हूँ
तुम मेरे साथ चलती हो…
जैसे धड़कन
अपने ही संगीत से अलग नहीं होती।

मैंने दूरी को कभी "जुदाई" नहीं माना,
दूरियाँ तो बस
दो शहरों के बीच की सड़कें हैं,
पर तुम्हारा होना
मेरे भीतर की सच्चाई है—
जो हर जगह मेरे साथ रहती है।

जो भी मैं छूता हूँ
उसमें तुम्हारी नरमी उतर आती है,
जो भी मैं सोचता हूँ
उसमें तुम्हारी रौशनी जल उठती है,
और जब मैं चुप रहता हूँ—
तब भी
तुम मेरी खामोशी में बोलती हो।

मुझे किसी मंज़िल से डर नहीं लगता,
क्योंकि तुम मेरा रास्ता हो,
मुझे किसी रात से घबराहट नहीं होती,
क्योंकि तुम मेरी सुबह हो।

दुनिया कहती है—
"तुम्हारे पास क्या है? "
और मैं मुस्कुरा देता हूँ…
मेरे पास
तुम्हारा एहसास है,
तुम्हारी धड़कन है,
तुम्हारा भरोसा है—
जो किसी तिजोरी में नहीं,
मेरी सांसों में रहता है।

मैं भाग्य से सवाल नहीं करता,
मैं कल की चिंता नहीं पालता,
क्योंकि मेरा "आज"
तुमसे ही पूरा होता है—
तुम्हारे नाम की तरह,
जो मेरे लहू में लिखा है।

तुम मेरे लिए सिर्फ प्रेम नहीं—
तुम वो अर्थ हो
जो हर बात को खूबसूरत बना देता है,
तुम वो स्पर्श हो
जो हर दर्द को सहने की ताकत देता है।

अगर कभी डर आए—
तो वह भी छोटा पड़ जाता है,
क्योंकि तुम मेरी हिम्मत हो,
और अगर कभी दुनिया बदल जाए—
तो भी
तुम मेरे भीतर स्थिर रहती हो
एक सच्चाई की तरह।

तुम मेरी जड़ों की नमी हो,
मेरे माथे का सुकून,
मेरी ज़िंदगी का वो दीपक
जो आँधी में भी जलता रहे।

और सुनो…
ये कोई एक दिन का वादा नहीं,
ये कोई कुछ लम्हों की बात नहीं,
ये तो वो रिश्ता है
जो शब्दों से बड़ा होता है—
जो वक्त के पार भी
अपना निशान छोड़ जाता है।

तुम मेरे अंदर रहती हो—
(मेरे ही दिल के भीतर)
इसलिए मेरा हर कदम
तुम्हारे नाम की तरफ जाता है…
और मेरा हर पल कहता है—
तुम…
मेरी दुनिया का सबसे खूबसूरत सच हो।

— पुष्प सिरोही

तुम मेरे अंदर रहती हो
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