एक पक्षी है—
जो खुले आकाश में
हवा के साथ
सीटी बजाता चलता है,
उसके पंखों में
धूप की चमक है,
और उड़ान में
विश्वास का गीत।
और एक पक्षी है—
जो लोहे की सलाखों के पीछे
अपनी ही सांसों से
टकराता रहता है।
उसकी आँखें
आसमान को पीती हैं,
और उसके पंख
हर रोज़
टूट-टूट कर भी
फिर फड़फड़ाते हैं।
आज़ाद पक्षी
नदी को अपना रास्ता समझता है,
पेड़ को अपना घर—
और बादलों को
मित्रों की टोली।
वो सपने नहीं मांगता,
वो बस
उड़ता है।
पर पिंजरे का पक्षी—
उड़ान नहीं मांगता…
वो तो
एक मौका मांगता है।
एक दरार,
एक खुला दरवाज़ा,
एक साँस
जो उसकी नहीं—
आजादी की हो।
जब हवा चलती है
तो वो पक्षी
सलाखों को पकड़ लेता है,
और उसकी उँगलियाँ
(या उसके पंजे)
थक जाते हैं।
फिर भी
वो रुका नहीं—
क्योंकि
रुक जाना
उसके लिए
मर जाना है।
उसकी आवाज़
खुशी नहीं—
पुकार है।
उसका गीत
मौसम नहीं—
मुक्ति का इश्तिहार है।
वो गाता है
क्योंकि उसके पास
उड़ने को पंख नहीं,
पर गाने को
आत्मा है।
वो गाता है
क्योंकि दर्द
जब ज़्यादा हो जाए,
तो आवाज़
प्रार्थना बन जाती है।
आज़ाद पक्षी
हवा में लिखता है
"मैं हूँ"—
और दुनिया तालियाँ बजाती है।
पिंजरे का पक्षी
खामोशी में लिखता है
"मैं भी हूँ"—
और दुनिया अक्सर
देखती नहीं।
लेकिन सुनो—
उस पिंजरे के भीतर
एक आग जलती है।
और हर गीत
सलाखों पर
एक चोट है।
कभी न कभी—
ये गीत
इतना ऊँचा होगा
कि ताले काँपेंगे,
इतना सच्चा होगा
कि ज़ुल्म शर्मिंदा होगा।
और जिस दिन
पिंजरा टूटेगा—
सिर्फ़ एक पक्षी नहीं,
एक युग उड़ेगा।
क्योंकि
आजादी
पंखों की नहीं,
हिम्मत की चीज़ है।
और जो पक्षी
कैद में भी
गाना जानता है—
वो एक दिन
आसमान को भी
अपना बना लेता है। 🕊️
----पुष्प सिरोही
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