वो (मैं) :
क्या मैं…
कहूँ?
वो (तुम) :
कहने से क्या होगा?
वो (मैं) :
कहने से नहीं—
महसूस करने से होगा…
क्या मैं…
तुम्हारे करीब आऊँ?
वो (तुम) :
इतनी जल्दी?
रात अभी बाकी है।
वो (मैं) :
मैं जल्दी में नहीं हूँ,
बस…
तुम्हारी दूरी में
सांसें अटकती हैं।
वो (मैं) :
क्या मैं…
तुम्हारा हाथ थाम लूँ?
वो (तुम) :
और अगर मैंने
हाथ दे दिया…
तो?
वो (मैं) :
तो मैं
उसे कसकर नहीं पकड़ूँगा,
मैं बस
उस हाथ में
अपना भरोसा रख दूँगा।
वो (मैं) :
क्या मैं…
तुम्हारी आँखों में
अपनी बात रख दूँ?
वो (तुम) :
तुम्हारी बात
कभी पूरी होती है?
वो (मैं) :
जब तुम सामने होती हो,
मेरी बात
सिर्फ शब्द नहीं रहती—
वो चुप्पी बन जाती है…
और चुप्पी
सबसे सच्ची भाषा है।
वो (मैं) :
क्या मैं…
तुम्हारी मुस्कान
चुरा लूँ?
वो (तुम) :
चुराओगे?
तो लौटाओगे भी?
वो (मैं) :
मैं लौटाऊँगा—
हर सुबह
थोड़ा और मीठा करके…
हर शाम
थोड़ा और सुकून देकर।
वो (मैं) :
क्या मैं…
तुम्हारे बालों में
उँगलियाँ रख दूँ?
वो (तुम) :
और अगर मैं
रुक गई…
तो?
वो (मैं) :
तो मैं
धीरे-धीरे समझ जाऊँगा
कि "हाँ"
कभी-कभी
बोला नहीं जाता—
बस ठहर जाता है।
वो (मैं) :
क्या मैं…
तुम्हारी खामोशी
सुन लूँ?
वो (तुम) :
मेरी खामोशी
भारी है।
वो (मैं) :
तो मैं
उस भार को
अपने सीने में
हल्का कर दूँगा।
वो (मैं) :
क्या मैं…
कह दूँ
कि मैं तुम्हें चाहता हूँ?
वो (तुम) :
चाहते हो
या निभा सकते हो?
वो (मैं) :
मैं निभा सकता हूँ—
मैं तुम्हें
एक रात की तरह नहीं,
एक जीवन की तरह चाहता हूँ।
वो (तुम) :
तो फिर…
क्या चाहोगे?
वो (मैं) :
बस इतना—
कि तुम
मुझे अपने करीब
आने की इजाज़त दो…
और मैं
तुम्हें डराए बिना
तुम्हारा हो जाऊँ।
वो (तुम) :
फिर… धीरे से…
वो (मैं) :
हाँ…
धीरे से।
— पुष्प सिरोही
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