मैं यूँ ही अकेला चला Poem by Pushp Sirohi

मैं यूँ ही अकेला चला

मैं यूँ ही अकेला चला जा रहा था—
बादलों के साये-सा,
हवा के साथ-साथ,
बिना किसी मंज़िल के…
बस चलते हुए।

तभी,
घाटी के मोड़ पर
धरती ने मुस्कुरा दिया—
पीले-पीले फूलों की कतारें,
जैसे धूप के छोटे टुकड़े
घास पर गिर पड़े हों।

वे झूम रहे थे,
हवा की उँगली पकड़कर—
एक साथ,
लहर-लहर,
जैसे खुशी ने
रिहर्सल कर रखी हो।

पास ही झील थी—
और झील की सतह पर
हल्का-सा चमकता पानी,
जिसमें फूलों की परछाइयाँ
नाचती जाती थीं।

मैं रुक गया।
मेरे भीतर का शोर
धीरे-धीरे
शांत होने लगा।
क्योंकि उन फूलों को
किसी वजह की ज़रूरत नहीं थी
खुश होने के लिए।

वे बस थे—
और यही
उनकी सबसे बड़ी
खुशी थी।

मैंने सोचा—
जिंदगी में
इतनी ही सादगी चाहिए:
थोड़ी हवा,
थोड़ी रोशनी,
और दिल में
किसी रंग का
सच।

फिर मैं आगे बढ़ गया,
पर फूल
मेरे भीतर रह गए।
जब भी कभी
थकान भारी हुई,
जब भी मन
सूना-सूना लगा,
वो पीली लहर
मेरी यादों में
फिर से बहने लगी।

और मैं—
अकेला होते हुए भी
अकेला नहीं रहा,
क्योंकि अब
मेरे मन के आँगन में
फूलों का नृत्य था।

— पुष्प सिरोही

मैं यूँ ही अकेला चला
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