ईर्ष्या—
कोई भावना नहीं,
एक जानवर है।
वो छाती में नहीं,
सीधे दिमाग में काटती है—
और फिर
दिल के हर कमरे में
शक का धुआँ भर देती है।
वो कहती है—
"देख… वो हँसी किसके लिए थी? "
"ये चुप्पी… तुझसे क्यों नहीं? "
"उसके पास फोन क्यों गया? "
"ये देर… सिर्फ़ देर नहीं है।"
और आदमी—
आदमी नहीं रहता।
वो जासूस बन जाता है।
वो अदालत बन जाता है।
वो जल्लाद बन जाता है।
ईर्ष्या
सबूत नहीं माँगती,
वो सिर्फ़
कल्पना को हथियार बनाती है।
मैंने देखा है
एक हँसता चेहरा
ईर्ष्या के हाथ में जाकर
कितना डरावना हो जाता है।
मैंने देखा है
प्यार—
जिसे हम इबादत कहते हैं—
ईर्ष्या के छूते ही
कितना अपमानजनक
संदेह बन जाता है।
ये ईर्ष्यादानव
धीरे-धीरे आता है।
सबसे पहले
वो विश्वास का गला दबाता है।
फिर
वो स्नेह को
सवाल बना देता है।
और अंत में
वो इंसान को
अपनी ही आँखों में
कमीना बना देता है।
सबसे ख़तरनाक बात?
ईर्ष्या
दुश्मन की तरह नहीं आती।
वो दोस्त बनकर आती है—
"मैं तुझे बचा रहा हूँ…"
"मैं तुझसे प्यार करता हूँ…"
"मैं बस सच जानना चाहता हूँ…"
और सच?
सच बहुत देर से आता है।
जब तक सच आए—
कुछ बचता ही नहीं।
मैं पूछता हूँ—
क्या प्यार इतना कमज़ोर है
कि एक शक
उसे तोड़ दे?
या फिर
हम इतने खोखले हैं
कि किसी की हँसी
हमें अपमान लगने लगे?
मैंने इस दानव को
कंधे पर बैठे देखा है—
उस आदमी के भी
जो खुद को "मर्द" कहता है।
पर मर्द वो नहीं
जो नियंत्रण करे,
मर्द वो है
जो विश्वास कर सके।
ईर्ष्या से बड़ा कोई ज़हर नहीं।
क्योंकि ईर्ष्या
वो अपराध है
जो बिना किए भी
सज़ा दिला देता है।
और सबसे बड़ा दुख—
ईर्ष्या
मारती नहीं पहले…
ईर्ष्या
चरित्र मारती है।
सावधान—
ये हरा दानव
खून नहीं पीता,
ये रिश्तों की
रूह पीता है।
— Pushp Sirohi
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