चलो—
चलते हैं…
इस शहर की उन गलियों में
जहाँ शामें
पीली रोशनी की तरह
धीरे-धीरे फैलती हैं,
और हवा
धुएँ की भाषा बोलती है।
मैं तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ…
पर शब्द
जेब में पड़े सिक्कों जैसे
खड़कते रहते हैं—
कभी निकलते नहीं।
सड़कें लंबी हैं,
और मेरी हिम्मत
उनसे भी लंबी
टाल-मटोल।
हर मोड़ पर
एक नया "क्या होगा? "
और हर कदम पर
एक नया "मत कह।"
कमरों में
लोग बातें करते हैं—
बड़ी-बड़ी, चमकदार बातें…
और मेरी खामोशी
काँच के गिलास में
ठहरी हुई चाय जैसी
ठंडी हो जाती है।
वे मुस्कुराते हैं,
वे देखते हैं,
वे नापते हैं—
मेरे कपड़ों को,
मेरे शब्दों को,
मेरे आत्मविश्वास को…
और मैं सोचता हूँ:
"क्या मेरी गर्दन
इतनी झुकी हुई दिखती है? "
मैंने अपने बालों में
अक्सर अपनी उम्र देखी है,
और अपनी आँखों में
अक्सर अपनी थकान।
मैं जानता हूँ—
मैं कोई तूफान नहीं,
मैं बस
एक धीमी-सी हवा हूँ
जो ख़ुद को भी
हिला नहीं पाती।
फिर भी…
कभी-कभी
तुम्हारा चेहरा
भीड़ के बीच
एक अकेला दीपक बनकर
मेरे भीतर जल उठता है।
और मैं…
मैं सचमुच
तुमसे कहना चाहता हूँ:
"तुम्हारा होना
मेरे भीतर की दुनिया को
कम शोर देता है।"
पर फिर—
वो वही डर…
वो वही सवाल…
"अगर मैंने कह दिया,
और तुमने
सिर्फ़ मुस्कुरा कर
विषय बदल दिया तो? "
मैं सोचता हूँ—
क्या मुझे हक़ है
इतनी बड़ी बात कहने का?
क्या मैं वो आदमी हूँ
जो अपनी इच्छा को
आवाज़ बना सके?
मैं तो वो हूँ
जो पार्टी में
दरवाज़े के पास खड़ा रहता है,
और अपने आप से कहता है—
"थोड़ा और रुक…
अभी नहीं…"
समय है—
हाँ, समय बहुत है—
क्योंकि टालना
मेरी सबसे बड़ी कला है।
मैं एक दिन में
हज़ार बार
शुरुआत करता हूँ,
और हर बार
बीच में
रुक जाता हूँ।
कभी मुझे लगता है
मैं समुद्र के किनारे
सीपियों की तरह
सिर्फ़ पड़े रहने के लिए बना हूँ—
बिना किसी लहर को
छूने की हिम्मत के।
और तुम…
तुम शायद
मुझे समझ भी लो,
या शायद
मुझे
एक हल्की-सी गलती समझकर
भूल जाओ…
फिर भी
मैं चलूँगा—
उस पीली शाम में,
उस धुएँ वाली हवा में—
अपने भीतर
एक अधूरी प्रेम-धुन लेकर…
और अंत में
मैं खुद से यही कहूँगा:
"कभी-कभी
प्रेम
कहने से नहीं,
ना कह पाने से
ज़्यादा सच होता है।"
— पुष्प सिरोही
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