मेरा सबसे पवित्र प्याला Poem by Pushp Sirohi

मेरा सबसे पवित्र प्याला

तुम मुझे
अपने होंठों से नहीं—
बस
अपनी आँखों से पिला दो।

क्योंकि तुम्हारी नज़र
मेरे लिए
शराब से भी गहरी है,
और तुम्हारी आँखों की एक घूँट
मेरी रूह को
मस्त कर देती है।

मेरे दोस्त
मदिरा का प्याला लाए,
मैंने कहा—
"हटा लो इसे।"

मैंने उनसे
एक छोटी सी विनती की—
"अगर कुछ देना है
तो उसकी आँखों की रोशनी दे दो,
क्योंकि वही
मेरी प्यास की भाषा है।"

मैं चाहता हूँ
तुम्हारी नजर
मेरे नाम से टकराए—
और मेरा दिल
झूम जाए।

मैं चाहता हूँ
तुम सिर्फ़ देखो…
और मैं
भीतर ही भीतर
पूरा त्योहार बना लूँ।

मैंने एक प्याली
तुम्हें भेजी थी—
सिर्फ़ रस्म नहीं,
इज़्ज़त थी।

मगर तुमने
उस प्याली को छुआ भी नहीं—
बस
अपनी नज़र रख दी उस पर।

और सच कहूँ,
जब वो लौटकर आई—
तो उसमें
मदिरा नहीं थी…
तुम थे।

मैंने उस प्याले को
होठों से लगाया—
और लगा
जैसे तुम्हारी आँखें
मेरी धड़कनों में उतर गई हों।

और एक पल को
मैं भूल गया
कि दुनिया क्या है,
कि समय क्या है—
बस
तुम्हारा असर था।

फूल भेजे थे मैंने,
सोचा था
तुम उन्हें
अपने बालों में लगा लोगी।

पर जब वे
मेरे पास लौटे—
तो उनमें
महक नहीं…
तुम्हारी साँस थी।

देखो न,
तुम्हारा प्रेम
अदृश्य होकर भी
इतना असली है—
कि बिना छुए भी
सब बदल देता है।

तुम्हारा होना
ऐसा है
जैसे हवा में
चाँद की रोशनी—
न हाथ में आती है,
पर रात को
सोने नहीं देती।

तो सुनो…
अगर तुम चाहो,
तो मुझे
एक जाम की जरूरत नहीं।

बस
एक बार
अपनी आँखों से
मेरे नाम का स्वाद चखा दो।

और मैं
पूरी उम्र
नशे में रहूँगा—
तुम्हारी ही
नज़र के नशे में।

क्योंकि
जब आँखें
सच में बोलती हैं,
तो होंठ
बस औपचारिकता रह जाते हैं।

और तुम…
तुम्हारी आँखें
मेरा सबसे पवित्र जाम हैं।
मेरा सबसे मधुर नशा।
मेरा सबसे सच्चा प्रेम।

---पुष्प सिरोही

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