उठो! समय ने आवाज़ दी है,
इतिहास फिर से द्वार पर है।
यह याचना नहीं, यह आदेश है—
भारत आज तुम्हारी राह पर है।
मुझसे मत पूछो क्या दूँगा,
मुझसे पूछो क्या ले सकोगे।
आराम, आलस, भय और समझौते—
क्या इन्हें छोड़ सकोगे?
यह युद्ध सीमा तक सीमित नहीं,
यह आत्मा की रणभूमि है।
जहाँ भ्रष्टाचार विष बन बैठा,
और अज्ञान सबसे बड़ी दुश्मनी है।
नवयुवक! नवयुवती!
अब मौन नहीं, हुंकार चाहिए।
कलम हो या कर्म, खेत हो या प्रयोगशाला—
हर हाथ में ललकार चाहिए।
जो कहे— "कोई और करेगा",
वह इतिहास में मिट जाएगा।
जो कहे— "मैं करूँगा",
वही भविष्य गढ़ जाएगा।
मत सोचो वर्दी पहनी या नहीं,
सोचो दिल में भारत है या नहीं।
जो श्रम राष्ट्र को आगे ले जाए,
वह देशभक्ति कम है— यह हो नहीं।
जहाँ गंदगी दिखे, वहीं सफ़ाई हो,
जहाँ अंधकार हो, वहीं दीप जले।
जहाँ रिश्वत का साया पड़े,
वहीं ईमानदारी शेर बने।
बेटा-बेटी में भेद नहीं,
दोनों रुद्र की शक्ति हैं।
नारी जब उठती है राष्ट्र के लिए,
तब सभ्यताएँ सुरक्षित रहती हैं।
नारे बहुत सुने इस धरती ने,
अब कर्म की बारी आई है।
पोस्ट नहीं, पसीना चाहिए—
इतिहास लिखने की घड़ी आई है।
अगर चाहिए स्वर्णिम भारत,
तो स्वर्ण सा चरित्र चाहिए।
अगर चाहिए स्वतंत्र भविष्य,
तो आज त्याग का शिखर चाहिए।
मैं आदेश देता हूँ—
डर को त्यागो, सत्य को थामो।
राष्ट्र तुम्हें देख रहा है,
अब आगे बढ़ो— और इतिहास बन जाओ।
यह पुकार है,
यह संकल्प है,
यह भारत का भविष्य है।
उठो!
क्योंकि भारत
आज भी तुमसे उम्मीद रखता है।
— पुष्प सिरोही 🇮🇳
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem