उठो! भारत पुकार रहा है Poem by Pushp Sirohi

उठो! भारत पुकार रहा है

उठो! समय ने आवाज़ दी है,
इतिहास फिर से द्वार पर है।
यह याचना नहीं, यह आदेश है—
भारत आज तुम्हारी राह पर है।

मुझसे मत पूछो क्या दूँगा,
मुझसे पूछो क्या ले सकोगे।
आराम, आलस, भय और समझौते—
क्या इन्हें छोड़ सकोगे?

यह युद्ध सीमा तक सीमित नहीं,
यह आत्मा की रणभूमि है।
जहाँ भ्रष्टाचार विष बन बैठा,
और अज्ञान सबसे बड़ी दुश्मनी है।

नवयुवक! नवयुवती!
अब मौन नहीं, हुंकार चाहिए।
कलम हो या कर्म, खेत हो या प्रयोगशाला—
हर हाथ में ललकार चाहिए।

जो कहे— "कोई और करेगा",
वह इतिहास में मिट जाएगा।
जो कहे— "मैं करूँगा",
वही भविष्य गढ़ जाएगा।

मत सोचो वर्दी पहनी या नहीं,
सोचो दिल में भारत है या नहीं।
जो श्रम राष्ट्र को आगे ले जाए,
वह देशभक्ति कम है— यह हो नहीं।

जहाँ गंदगी दिखे, वहीं सफ़ाई हो,
जहाँ अंधकार हो, वहीं दीप जले।
जहाँ रिश्वत का साया पड़े,
वहीं ईमानदारी शेर बने।

बेटा-बेटी में भेद नहीं,
दोनों रुद्र की शक्ति हैं।
नारी जब उठती है राष्ट्र के लिए,
तब सभ्यताएँ सुरक्षित रहती हैं।

नारे बहुत सुने इस धरती ने,
अब कर्म की बारी आई है।
पोस्ट नहीं, पसीना चाहिए—
इतिहास लिखने की घड़ी आई है।

अगर चाहिए स्वर्णिम भारत,
तो स्वर्ण सा चरित्र चाहिए।
अगर चाहिए स्वतंत्र भविष्य,
तो आज त्याग का शिखर चाहिए।

मैं आदेश देता हूँ—
डर को त्यागो, सत्य को थामो।
राष्ट्र तुम्हें देख रहा है,
अब आगे बढ़ो— और इतिहास बन जाओ।

यह पुकार है,
यह संकल्प है,
यह भारत का भविष्य है।

उठो!
क्योंकि भारत
आज भी तुमसे उम्मीद रखता है।

— पुष्प सिरोही 🇮🇳

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
कविता: "उठो! भारत पुकार रहा है" — व्याख्यात्मक नोट यह कविता भारत के इतिहास और भविष्य के बीच खड़े युवा भारत का घोषणापत्र है। इसकी शैली में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आदेशात्मक हुंकार और रामधारी सिंह दिनकर की ओजस्वी, निर्भीक काव्य-लय का समन्वय दिखाई देता है। यह रचना विनती नहीं करती, यह जगाती है, झकझोरती है और जिम्मेदारी सौंपती है। कविता का मूल संदेश यह है कि देशभक्ति केवल भावनाओं या नारों तक सीमित नहीं, बल्कि त्याग, कर्म और चरित्र से सिद्ध होती है। यह स्पष्ट करती है कि राष्ट्र के शत्रु केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, अशिक्षा, गंदगी, भय और आलस्य के रूप में हमारे भीतर भी छिपे होते हैं। कविता नवयुवक और नवयुवती— दोनों को समान रूप से संबोधित करती है। यह समावेशी दृष्टि बताती है कि राष्ट्रनिर्माण स्त्री-पुरुष के साझा संकल्प से ही संभव है। "मुझसे मत पूछो क्या दूँगा" जैसी पंक्तियाँ नेताजी की उस ऐतिहासिक चेतना की याद दिलाती हैं जहाँ देश नागरिकों से बलिदान और साहस की माँग करता है, और बदले में सम्मानित भविष्य देता है। दिनकर-शैली का ओज कविता को केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि मंच से गर्जना योग्य बनाता है— जहाँ शब्द हथियार बन जाते हैं और श्रोताओं के भीतर रुद्र चेतना जगा देते हैं। यह कविता यह भी स्थापित करती है कि वर्दी में सेवा करना गौरव है, पर बिना वर्दी के ईमानदार निर्माण भी उतनी ही बड़ी देशसेवा है। समर्पण समर्पित: मेरे पिता — मास्टर जी (श्री एस. पी. एस. सिरोही) यह कविता मेरे पिता मास्टर जी — श्री एस. पी. एस. सिरोही को सादर समर्पित है। वे एक शिक्षक थे, पर केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते थे— वे भारत गढ़ते थे। उनके शब्द, उनकी डाँट, और उनका अनुशासन अक्सर ऐसे ही वाक्यों से भरा होता था— जो मुझे केवल भारतीय नहीं, गर्वित और जिम्मेदार भारतीय बनाते थे। नेताजी की हुंकार और दिनकर का ओज जो इस कविता में गूंजता है, वह कहीं न कहीं मास्टर जी के वही वाक्य हैं जो उन्होंने जीवन भर दोहराए— "देश पहले, और बाकी सब बाद में।" यह कविता मेरी लेखनी की नहीं, उनके संस्कारों की उपज है। — पुष्प सिरोही 🇮🇳
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