हम मिले नहीं… एक-दूसरे में मौजूद थे Poem by Pushp Sirohi

हम मिले नहीं… एक-दूसरे में मौजूद थे

मैं तुम्हें ढूँढता रहा—
शहरों की गलियों में,
दुआओं की उंगलियों में,
ख़ामोशी की लकीरों में।

और तुम…
हर बार
मुझे "कहीं और" भेज देती रहीं—
जैसे मिलन कोई दूरी का नाम हो।

फिर एक रात
मेरी रूह ने धीमे से कहा—
"तू प्यास क्यों है,
जब दरिया तेरे अंदर बह रहा है? "

मैं ठहर गया…
क्योंकि अचानक
समझ में आया—

तुम कोई रास्ता नहीं थीं,
तुम तो मेरे अंदर की दिशा थीं।

तुम कोई मंज़िल नहीं थीं,
तुम तो मेरे चलने की वजह थीं।

मैं जिस प्रेम को
आँखों के सामने खोज रहा था—
वो प्रेम
मेरे रक्त में पहले से लिखा था।

तुम्हारी याद
मेरे भीतर
ऐसे रहती थी
जैसे आग में
राख छुपी रहती है—
दिखती नहीं
पर मिटती नहीं।

लोग कहते हैं—
"इश्क़ में मिलने के लिए
किस्मत चाहिए।"

मैं कहता हूँ—
जिसे तुम "मिलना" कहते हो
वो दरअसल
याद करना है—
कि हम दो नहीं थे।

हम अलग-अलग शरीर थे,
पर एक ही पुकार थे।

और जब भी तुम पास आईं,
हम मिले नहीं…
बस
पहचान हो गई।

क्योंकि प्रेमी
आख़िर में कहीं नहीं मिलते—
वे शुरू से ही
एक-दूसरे में
मौजूद होते हैं।

— Pushp Sirohi

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success