ओ तुम—
जिन्हें देखकर
मेरे भीतर का समय
धीरे चलने लगता है,
जैसे किसी प्राचीन कलश के पास
हवा भी
सभ्य होकर ठहर जाए…
तुम्हारा चेहरा
कोई साधारण दृश्य नहीं,
यह तो
किसी पुराने युग की
कोमल मूर्ति है—
जिसे देखकर
मन कहता है:
कुछ सुंदर
कभी नष्ट नहीं होता।
मैं, पुष्प सिरोही,
तुम्हें देखता हूँ
तो लगता है
जैसे जीवन ने
अपनी सारी थकान
क्षण भर को
छुपा ली हो।
तुम हँसती हो—
और वह हँसी
मेरे भीतर
एक ऐसी बाँसुरी बजाती है
जिसकी ध्वनि
कानों तक नहीं,
सीधे आत्मा तक जाती है।
तुम बोलती हो—
और शब्द
किसी प्रेमी के हाथ में
फूल बन जाते हैं;
तुम चुप होती हो—
और मौन
सबसे गहरी कविता लिख देता है।
ओ स्त्री!
तुम्हारी आँखों में
कुछ ऐसा है
जो न नदी है,
न समुद्र—
फिर भी
मैं उसमें डूब सकता हूँ…
और डूबकर भी
बच सकता हूँ।
तुम्हारा सौंदर्य
आईने का मोहताज नहीं,
क्योंकि तुम
आईने के पहले
स्वयं में पूर्ण हो।
और मैं
तुम्हारी पूर्णता के सामने
अपना अधूरापन
सच्चाई से स्वीकार करता हूँ।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ—
प्रेम क्या है?
शायद वह
वही क्षण है
जब तुम्हारा नाम
मेरे भीतर
किसी मंत्र की तरह
दोहराया जाता है…
बिना किसी कारण के।
ओ तुम—
तुम्हारे पास बैठकर
मैं अपने भीतर
एक बेहतर पुरुष
जन्म लेते देखता हूँ;
क्योंकि तुम्हारी उपस्थिति
मेरे अहं को
धीरे से
सभ्यता सिखाती है।
मैं जानता हूँ—
जीवन बहता है,
चेहरे बदलते हैं,
मौसम पलटते हैं;
पर तुम्हारे भीतर
एक ऐसी रोशनी है
जो समय से बहस नहीं करती—
बस
समय को जीत लेती है।
तुम्हारी सुंदरता
क्षणिक नहीं,
यह तो
किसी कलश पर उकेरी गई
अमर कथा है—
जिसे देखकर
हर युग कहेगा:
"हाँ…
इसी को
कोमलता कहते हैं।"
और यदि कभी
मेरी सांसों का संगीत
थमने लगे,
तो भी यह सच रहेगा—
कि मैंने
अपनी ज़िंदगी में
एक बार
सुंदरता को
सच की तरह
चलते देखा था—
और वह सुंदरता…
तुम थीं। ---------पुष्प सिरोही
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