हसीन रातें Poem by Pushp Sirohi

हसीन रातें

हसीन रातें—
हाँ… हसीन रातें—
अगर तुम मेरे पास हो,
तो ये रातें
किसी तूफान का गीत बन जाएँ।

मैं थक गया हूँ
दुनिया की सभ्यता से,
उन रिश्तों से
जो "क्या लोग कहेंगे" में जीते हैं,
उन छूने से
जो डर के साथ होते हैं,
उन बातों से
जो सच को छुपाकर की जाती हैं।

मैं चाहता हूँ
एक ऐसी रात
जिसमें कोई नकाब न हो,
कोई बनावट न हो,
बस तुम हो…
और मैं हूँ…
और हमारे बीच
सिर्फ सच्चाई की गर्म साँसें।

हसीन रातें—
क्योंकि मेरा दिल
अब पिंजरे में नहीं रहना चाहता।
ये दिल
तुम्हारे नाम की ओर
दौड़ता है,
जैसे समंदर
किनारों को तोड़कर
अपनी असली भाषा बोलता है।

तुम्हारी बाँहें—
मेरे लिए
किसी बंदरगाह जैसी हैं,
जहाँ मैं
जीत-हार छोड़कर
सिर्फ "अपना" बन जाता हूँ।

और तुम्हारा स्पर्श—
वो कम्पास है
जो मेरे भीतर के
सारे रास्ते
तुम्हारी ओर कर देता है।

मैं चाहता हूँ
कि ये रात
लंबी हो…
इतनी लंबी
कि सुबह
हमसे पूछे—
"तुम दोनों में
कौन पहले जागा? "

मैं चाहता हूँ
कि तुम
मेरी धड़कनों की
कश्ती में बैठ जाओ,
और मैं
तुम्हारी आँखों के
समंदर में उतर जाऊँ—
जहाँ लहरें
सिर्फ "तुम" कहें,
और हर किनारा
सिर्फ "हम"।

हसीन रातें—
क्योंकि तुम्हारे बिना
मैं आधा हूँ,
और तुम्हारे साथ
मैं पूरा…
और बेखौफ हूँ।

अगर प्यार
इबादत है,
तो आज रात
मैं उसी इबादत में
सिर झुकाना चाहता हूँ—
तुम्हारे पास,
तुम्हारी साँसों के करीब,
तुम्हारी खामोशी के अंदर।

और फिर
अगर दुनिया पूछे—
"क्या हुआ? "
तो मैं मुस्कुराकर कहूँगा—

"कुछ नहीं…
बस हसीन रातें थीं—
और मैंने
अपने दिल का घर
अपने प्यार में पा लिया।"

— पुष्प सिरोही

हसीन रातें
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