फिर भी मैं उठता हूँ Poem by Pushp Sirohi

फिर भी मैं उठता हूँ

तुम मेरी हार की
कहानी लिखते रहो,
मैं अपनी जीत का
अध्याय बन जाऊँगा।

तुम मेरी चुप्पी को
कमज़ोरी समझो,
मैं अपनी खामोशी से ही
तूफ़ान उगा दूँगा।

तुम मेरे कदमों पर
शक की धूल उड़ाओ,
मैं उसी धूल से
अपनी राह चमका दूँगा।

तुम मुझे गिराने के लिए
शोर मचाते रहो,
मैं हर गिरावट के बाद
और ऊँचा उठ जाऊँगा।

मैं टूटता हूँ?
हाँ…
पर टूटना
मेरा अंत नहीं।
मैं बिखरता हूँ?
हाँ…
पर बिखरना
मेरा हारना नहीं।

मेरे भीतर
एक आग है
जो बुझती नहीं,
और मेरी आँखों में
एक सपना है
जो झुकता नहीं।

तुम मेरे जख्मों पर
हँसते रहो,
मैं अपने जख्मों को
ताज बना लूँगा।

तुम मेरे हिस्से की
रोशनी छीनो,
मैं अंधेरे से भी
दीपक जला लूँगा।

क्योंकि
मैं मिट्टी नहीं,
मैं बीज हूँ—
दबाओगे तो
फूट पड़ूँगा।

मैं गुलाम नहीं,
मैं इरादा हूँ—
तोड़ोगे तो
और मजबूत हो जाऊँगा।

तुम मेरे रास्ते में
दीवार बनो,
मैं दीवार में
दरवाज़ा बन जाऊँगा।

तुम मुझे रोकने की
कसम खाते रहो,
मैं चलने की
कसम निभाऊँगा।

और सुनो—
मैं गिरकर भी
मुस्कुराता हूँ,
क्योंकि
मेरी मुस्कान में
मेरे संघर्ष की
ज़िद बसती है।

आज भी
मेरे भीतर
एक आवाज़ बोलती है—
"उठ…
ये दुनिया तेरी परीक्षा है,
तेरी पहचान नहीं।"

इसलिए…मैं रुकने वालों में नहीं।
मैं झुकने वालों में नहीं।
मैं मिटने वालों में नहीं।

मैं…उठने वालों में हूँ। ----पुष्प सिरोही

फिर भी मैं उठता हूँ
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