मित्रता—
न कोई सौदा है,
न कोई शर्त,
यह तो हृदय के आँगन में
जलता हुआ
एक निर्मल दीप है।
मित्र—
वह नहीं
जो केवल आवश्यकता में पास आए,
मित्र वह है
जो प्रसन्नता के उजाले में भी
तुम्हारे साथ
मुस्कुराना जानता हो।
जब मैं हार कर
स्वयं से रूठ जाता हूँ,
मित्रता मुझे
समझाती नहीं—
बस धीरे से
मेरे भीतर
हिम्मत जगा देती है।
मित्रता एक दर्पण है—
जो सत्य दिखाता है,
पर इस तरह
कि सत्य भी
कठोर न लगे,
और आत्मा भी
आहत न हो।
कभी-कभी
हम कुछ कहते नहीं,
फिर भी सब समझ जाते हैं—
जैसे दो नदियाँ
बिना शब्दों के
एक ही सागर की ओर
बहती रहती हैं।
मित्रता
बंधन नहीं,
यह तो स्वतंत्रता है—
जहाँ दो आत्माएँ
एक-दूसरे को
बाँधती नहीं,
बल्कि
उड़ान देती हैं।
और जब जीवन
थककर पूछता है—
"अब आगे कैसे? "
तो मित्र
मौन में भी
उत्तर बन जाता है—
"एक कदम और…
मैं साथ हूँ।"
मित्रता का अर्थ
सिर्फ साथ चलना नहीं,
गिरते हुए को
सम्हाल लेना है—
और जब संसार
द्वार बंद कर दे,
तब भी
अपना बनकर
ठहर जाना है।
और अंत में
मैं यह स्वीकार करता हूँ—
मैं ही मेरा सबसे अच्छा मित्र हूँ।
इस उजली, सच्ची और अद्भुत मित्रता के लिए धन्यवाद।
— पुष्प सिरोही
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