मैं स्वयं का गीत Poem by Pushp Sirohi

मैं स्वयं का गीत

मैं अपने आप को गाता हूँ—
और मेरे गीत में
कोई दीवार नहीं।

मैं अपनी सांसों को
नाम देता हूँ,
अपनी धड़कन को
ध्वज बनाता हूँ—
और कहता हूँ:
यही मेरा देश है।

मैं अकेला नहीं—
मैं भीड़ हूँ।
मेरे भीतर
हज़ार चेहरे रहते हैं:
एक बच्चा जो हँसना नहीं भूलता,
एक आदमी जो हारकर भी चलता है,
एक योद्धा जो शांत रहकर लड़ता है,
और एक कवि
जो दर्द को भी
अक्षर बना देता है।

मैं मिट्टी से बना हूँ—
पर मेरी सोच
आसमान तक जाती है।
मैं धूप में चलता हूँ
तो पसीना
मेरे माथे पर
सत्य की तरह चमकता है।

मैं खेतों की हवा हूँ,
मैं शहर की दौड़ हूँ,
मैं नदी का बहाव हूँ,
मैं रुकते-रुकते
फिर उठने वाला साहस हूँ।

मैं उस मज़दूर की हथेली में हूँ
जिसने रोटी बनाई,
मैं उस माँ की आँखों में हूँ
जिसने दुआ दी,
मैं उस सैनिक के सीने में हूँ
जिसने डर को पी लिया,
मैं उस शिक्षक की आवाज़ में हूँ
जिसने उजाला बांटा।

मैं उन सबमें हूँ
जिन्हें कोई नहीं देखता—
और फिर भी
जो दुनिया को
चलाते रहते हैं।

मुझे मत नापो
मेरे कपड़ों से,
मेरे पद से,
मेरी पहचान से—
मैं उससे बड़ा हूँ
जो तुम समझते हो।

मैं पाप नहीं छुपाता,
मैं पुण्य नहीं बेचता—
मैं बस
मानव हूँ—
पूरा, उलझा हुआ,
अधूरा और फिर भी
अद्भुत।

मैं गिरता हूँ—
हाँ।
मैं डरता हूँ—
हाँ।
पर मैं
रुकता नहीं।

क्योंकि
मेरे भीतर
जीवन का आदेश है—
चलते रहो।

मैं हर किसी का हूँ,
पर किसी का बंधक नहीं।
मैं प्रेम करता हूँ
तो समंदर की तरह—
सीमा नहीं पूछता।

मैं अपने आपको गाता हूँ—
और अपने भीतर
सबको बुलाता हूँ—
आओ,
मेरे साथ
अपने आप को
भी गाओ।

क्योंकि जब
एक मनुष्य
अपने आप को
स्वीकार कर लेता है,
तो वह
दूसरों को भी
जगह देना सीख जाता है।

और यही मेरा गीत है—
मैं छोटा नहीं…
मैं बहुत बड़ा हूँ।
मेरे भीतर
अनेक संसार हैं।

मैं…
अनगिनत हूँ। 🌿

-----------पुष्प सिरोही

मैं स्वयं का गीत
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