उस शांत रात में यूँ मत बुझ जाना,
जब साँसें धीमी हों, जब सन्नाटा गहरा हो—
चुपचाप समर्पण नहीं…
अपने भीतर की आग को
और तेज़ करना।
क्योंकि रातें सिर्फ़ अंत नहीं होतीं,
वे इम्तिहान होती हैं—
और जो जीना जानते हैं,
वे अंधेरे में भी
अपने सूरज बचा लेते हैं।
जो बुद्धिमान हैं—
वे जानते हैं
कि एक दिन जाना है;
फिर भी
अपने शब्दों की बिजली से
समय को झकझोरते हैं।
जो अच्छे हैं—
वे पछताते हैं
कि उनकी रोशनी
और फैल सकती थी;
इसलिए
वे ढलते हुए दिन में भी
दीपक की तरह
दहकते हैं।
जो नेक हैं—
वे हँसते हैं,
जैसे जीवन दान कर दिया हो;
और जानते हुए भी
कि कुछ नहीं मिलेगा—
तब भी
पीछे नहीं हटते।
जो गंभीर हैं—
जिनकी आँखों ने
सत्य की गहराई देखी है,
वे अपने आँसू
कमज़ोरी नहीं बनाते—
वे आँसुओं को
हौसले में बदलते हैं।
मत झुक जाना
इस "अच्छी" कहलाने वाली रात के आगे—
यह अच्छी तब है
जब तुम
अपने हिस्से की रोशनी
पूरी जला चुके हो।
तो…
थक जाओ—पर रुको मत,
टूट जाओ—पर झुको मत,
गिर जाओ—पर खत्म मत हो,
क्योंकि अंत
तभी सुंदर है
जब संघर्ष
पूरा हो।
आँखों में आग रखो,
सीने में तूफान रखो,
और समय से कहो—
"मैं अभी बाकी हूँ।"
और जब वो रात
तुम्हारे दरवाज़े पर आए,
तो उसे देखकर
मुस्कुरा देना—
पर समर्पण नहीं,
बस
एक आख़िरी बार
जीवन की तरफ़
गरज जाना।
उस शांत रात में यूँ मत बुझ जाना—
बुझते उजाले के विरुद्ध गरज जाना।
— पुष्प सिरोही
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